महाबोधि परिषद



महाबोधि परिषद

1891 में स्थापित महाबोधि परिषद की स्थापना मुख्य रूप से बोध गया मंदिर के उद्धार के लिए की गयी थी। उसकी स्थापना दो संस्थाओं के रूप में हुई : 1921 में भारत की कानूनी आवश्यकताओं को ध्यान देकर वहाँ भारत की महाबोधि परिषद का पंजीकरण किया गया और सिलोन में (अद्यतन श्री लंका) भी महाबोधि परिषद की स्थापना हुई। 1926 में अनागारिक ने ब्रिटेन में भी महाबोधि परिषद की स्थापना की। उसके बाद अमेरिका, जापान आदि दुनिया के कई देशों में भी महाबोधि परिषदों की स्थापना हुई। आरंभिक काल में सिलोन (अद्यतन श्री लंका) की महाबोधि परिषद बहुत सक्रिय थी। ग्रामीण बौद्ध बच्चे, जो ईसाई मिशनरी स्कूलों में दाखिला लेने के अवसर न मिलने के कारण उचित माध्यमिक शिक्षा नहीं ले पाते थे, महाबोधि परिषद के द्वारा उन ग्रामीण बौद्ध बच्चों के लिए स्कूलों की स्थापना हुई।

यद्यपि देश की औपचारिक शिक्षा का उद्भव परिवेण (बौद्ध मंदिर केंद्रित) शिक्षा के आधार पर हुआ, तथापि मिशनरी स्कूलों का आगमन शिक्षा को कहीं अधिक ऊँचे स्तर पर ले गया। फिर भी उसका नकारात्मक पक्ष यह था कि उन स्कूलों में कुछ धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ ईसाई धर्म पढ़ाया जाता था, जो उस धर्म के पक्ष में लोगों को बदलने का सूक्ष्म तरीका था। जिन बच्चों का बपतिस्मा नहीं किया गया था, कुछ स्कूलों में उनका दाखिला नहीं किया गया। सबसे पहले समाज ने कर्नल एच. एस. ओल्कॉट, सी. डब. लीड्बीटर आदि शिक्षाविद एवं बौद्ध ब्रहमविद्या संग (BTS) के साथ इस महान कार्य के लिए हाथ बँटाये। जब श्री लंका की उत्तर-औपनिवेशिक सरकार ने 1962 में सभी निजी स्कूलों को अपने नियंत्रण के अधीन ले लिया, तब देश के 102 स्कूल महाबोधि परिषद से संचालित थे।

यद्यपि देश की औपचारिक शिक्षा का उद्भव परिवेण (बौद्ध मंदिर केंद्रित) शिक्षा के आधार पर हुआ, तथापि मिशनरी स्कूलों का आगमन शिक्षा को कहीं अधिक ऊँचे स्तर पर ले गया। फिर भी उसका नकारात्मक पक्ष यह था कि उन स्कूलों में कुछ धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ ईसाई धर्म पढ़ाया जाता था, जो उस धर्म के पक्ष में लोगों को बदलने का सूक्ष्म तरीका था। जिन बच्चों का बपतिस्मा नहीं किया गया था, कुछ स्कूलों में उनका दाखिला नहीं किया गया। सबसे पहले समाज ने कर्नल एच. एस. ओल्कॉट, सी. डब. लीड्बीटर आदि शिक्षाविद एवं बौद्ध ब्रहमविद्या संग (BTS) के साथ इस महान कार्य के लिए हाथ बँटाये। जब श्री लंका की उत्तर-औपनिवेशिक सरकार ने 1962 में सभी निजी स्कूलों को अपने नियंत्रण के अधीन ले लिया, तब देश के 102 स्कूल महाबोधि परिषद से संचालित थे।

1915 में जब दंगे फैल गये, ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने समाज को तोड़ डालने के लिए परिस्थिति का लाभ उठाया। तत्काल में परिषद के द्वारा अट्ठाईस (28) स्कूलों का संचालन हुआ। उनका अनुदान निलंबित किया गया। ‘सिंहल बौद्धया’ नामक उसकी पत्रिका के मुद्रणालय का मोहरबंद करके रोक लगाया गया। वे अनागारिक धर्मपाल को पकड़ नहीं पाये, इसलिए उनके भाई एडमंड हेवावितारण का गिरफ़्तार करके उन्हें तमाचा मार दिया और दूसरे को भी दुकानों में घुसकर तोडफोड करने और राजद्रोह का आरोप लगाकर उन दोनों पर सैनिक कानून (मार्शल लॉ) के तहत मुक़द्दमा चलाया गया। दंगे की आग शांत होने के बाद परिषद के द्वारा संचालित स्कूल परिषद को लौटे दिये गये लेकिन प्रत्येक स्कूल के लिए 1000 रुपये की दर से उन्हें फिर से खरीद लेना पड़ता था। हेवावितारण परिवार के ‘दॉन करोलिस और पुत्र’ उद्योग ने उन स्कूलों के कुर्सी-मेज़ का प्रबंध किया और परिषद ने न केवल वेतन का भुगतान किया बल्कि शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय की भी स्थापना की।

जब ब्रिटिश सरकार ने सिलोन को एक केवल चाय के एक बड़े बागान की नज़र से और उसे रबर और मसाले देने वाले के रूप में देखना चाहा, उनके मन में केवल औद्योगीकरण का लक्ष्य ही था। सिलोन के लिए सभी औद्योगिक सामाग्री ब्रिटेन से आयात की गयीं। तब भी महाबोधि परिषद ने श्री लंका के प्रथम औद्योगीकरण कार्यक्रम का उद्घाटन किया। 1912 में ‘हेवावितारण औद्योगिक केंद्र’ की स्थापना की गयी और परिषद के द्वारा देश के कुछ युवकों को उद्योग के प्रशिक्षण लेने जापान और कुछ युवकों को माचिस बनाने की विधि से संबंधित ज्ञान लेने स्वीडन भेज दिये गये। हेवावितारण औद्योगिक छात्रवृत्ति के द्वारा भारत जाकर कताई और बुनाई सीखने के लिए युवकों को चुन लिया गया। वापस आकार उन्होंने ‘त्री जेम्स’ नामक देश के प्रथम माचिस उद्योग की स्थापना की। उसके बाद ‘टू एलिफंट्स’ नाम से भी माचिस के उद्योग की स्थापना हुई। 1915 के दंगे के बीच ब्रिटिश सरकार ने हेवावितारण औद्योगिक विद्यालय को भी बंद कर दिया, जिससे प्रकट होता है कि अंग्रेज़ों ने किस प्रकार समाज के कार्यों को किस प्रकार लक्ष्य बनाया।

अनागारिक धर्मपाल ने नवगठित महाबोधि परिषद को अपने राष्ट्रवादी आंदोलन का साधन बनाकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध कड़ा विरोध किया। उन्होंने यह विरोध स्कूलों की स्थापना, संपत्ति का मोल लेना और टूटे-फूटे बौद्ध मंदिरों की मरम्मत करना आदि कार्य करते हुए सिलोन के ग्रामीण प्रदेशों में यात्रा करने के दौरान भी किया। परिषद की दूसरी आवाज़ सिंहल बौद्धया पत्रिका से थी, जिससे विदेशी शासन के विरुद्ध अथक अभियान चलता था। पत्रिका का सर्वप्रथम लोकार्पण 1906 में हुआ, जिससे धर्मपाल जी के संदेश देशभर के बहुसंख्यक लोगों तक पहुँच गये। “ओ सिंहली! अपनी नींद से उठ जा!” उसका घोष था। उस पत्रिका में न केवल बौद्ध समाचार और धर्मपाल के व्याख्यान अंतर्गत थे बल्कि युद्ध (प्रथम विश्व युद्ध), राजनीति, अर्थशास्त्र और सामाजिक समस्या आदि से संबंधित समाचार भी अंतर्गत थे। उसका प्रकाशन आज तक हो रहा है; अब वह हर महीने की पूर्णिमा के दिन प्रकाशित होती है।

1933 में सारनाथ में मूलगंध कुटी विहार के उद्घाटन और उसके बाद ही श्री लंका के यात्री बड़ी संख्या में भगवान बुद्ध की पूजा करने भारत की यात्रा करने लगे। भारत की महाबोधि परिषद ने यात्री के लिए भारतीय रेलवे में रियायती किराने का प्रबंध किया। तब से हज़ारों श्री लंकाई यात्रियों को पवित्र स्थल देखने जाने की सुविधा मिली। हल में भारत की सरकार ने वाराणसी में (सारनाथ के आसपास) और गया में (बोध गया के आसपास) अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों का उद्घाटन किया। थोड़े समय के लिए श्री लंका के पवित्र नगर अनुराधपुर में भी परिषद ने अपनी एक शाखा खोली, जिससे ‘महाबोधि सँगराव’ (अर्थात ‘महाबोधि पत्रिका’) नामक पत्रिका का प्रकाशन हुआ। श्री लंका की तीर्थ-यात्रियों को भारत के पवित्र स्थलों को देखने के लिए भेजना परिषद का एक प्रमुख कार्य है। परिषद के तत्वावधान से 1925 में भारत गये यात्रियों के दल में नील हेवावितारण दंपति, राजा हेवावितारण दंपति, और श्री के. टी. विमलसेकर थे। तत्काल में बोध गया से संबंधित संघर्ष भी बढ़ रहा था और तब तक अनागरिक धर्मपाल और कुछ बौद्ध भिक्षुओं के सिवाय सिलोन से और कोई वहाँ नहीं गया था। उस समय वहाँ का माहौल इतना सुरक्षित नहीं था।

2021 में बौद्ध देशों के हज़ारों यात्रियों ने कुशीनगर (जहाँ गौतम बुद्ध का परिनिर्वाण हुआ) की यात्रा की। अनागारिक धर्मपाल संगठन ने विद्योदय परिवेण के सामने संगठन के मुख्यालय में ‘महाबोधि मंदिरय’ नामक नयी इमारत का निर्माण किया, जहाँ अनागारिक धर्मपाल जी ने 1891 में महाबोधि परिषद की स्थापना की थी। महाबोधि मंदिरय का ‘अग्रश्रावक विहार’ में भगवान बुद्ध के अग्रश्रावक अरिहंत मोद्गल्यायन एवं अरिहंत सरिपुत्र के पवित्र अवशेष रखे हुए हैं। ये पवित्र अवशेष भारत के सांची से मिले थे, बाद में ब्रिटिश विक्टोरिया और अल्बर्ट संग्रहालय में रखे थे और तत्पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के भारत के राज्य सचिव के द्वारा ब्रिटिश महाबोधि परिषद को सौंपे गये थे और अंत में श्री लंका लाये गये।

*(संदर्भ : ‘They Turned The Tide’ and ‘Maha Bodhi Kathawa’ – The 100-year History of the Maha Bodhi Society of Sri Lanka by Sinha Ratnatunga; Government Press, Sri Lanka 1991.)



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