(1873 से 19 नवंबर 1915 तक)
एडमंड, अनागारिक धर्मपाल के छोटे भाइयों में से एक था। 1915 में जब देश में कुख्यात सांप्रदायिक दंगे हुए, तब वह पारिवारिक व्यवसाय, सीमाबद्ध एच. दॉन करोलिस और पुत्र के प्रबंध निदेशक था। हेवावितारण परिवार, द्वीप के ब्रिटिश प्रशासकों की कड़ी निगरानी में था। ब्रिटिश पुलिस के मुख्य अधिकारी ने अनागारिक को एक कष्टप्रद सत्ता बताया है, जो उस समय के एक उपनिवेशवाद-विरोधी अभियान में प्रमुख थे। दंगो के समय अनागारिक धर्मपाल भारत में थे (तत्पश्चात सिलोन में जो कुछ हो रहा था, उसके लिए निरोध आदेश पर उन्हें नज़रबंद रखा गया) और जब दंगे मरदान इलाके तक फैल गये, तब उन्होंने तुरंत ही एडमंड हेवावितारण को मरदान केज़र गली में स्थित उसकी लकड़ी के सामान की दुकान से गिरफ्तार किया। उसपर और एक और व्यक्ति पर देशद्रोह तथा दुकान लूटने के झूठे आरोप लगा दिये गये। एक सैन्य अदालत के द्वारा उनपर मुकद्दमा चलाया गया और उन्हें दोषी ठहराया गया।
उनके परपोतों में से एक इस घटना के बारे में लिखता है कि :
मेरी आच्ची (दादी) की गोदी में ही मैंने पहली बार 1915 के दंगों के बारे में सुना था। मेरे छोटे कानों के लिए वह बस मेरी दादी की कहानियों में से एक और कहानी थी। उन विक्षुब्ध युगों का महत्व मुझे बाद में समझ आया, जब एक युवा विधि छात्र के रूप में मुझे ब्रिटिश राज के फील्ड जनरल कोर्ट मार्शल के कार्यवाही की जानकारी मिली, जिससे उन दंगो के जाँच-परीक्षण किये गये।
आच्ची के पति - मेरे दादा जी किशोर थे, जब उनके पिता जी- एडमंड हेवावितारण (अनागारिक धर्मपाल का छोटा भाई) को नमानिदेवगे अल्बर्ट विजेसेकर के साथ राजकीय सेना के तोपखाने के लेफ्टिनेंट कर्नल आर. एल. मुसप्रेट विलियम्स की अध्यक्षता में ड्रमहेड कोर्ट मार्शल (युद्धभूमि में सैनिक दंड) के समक्ष घसीटा गया था और उनपर देशद्रोह तथा दुकान लूटने के आरोप लगाये गये थे।
साधारण कानून को रद्द कर दिया गया था। राज्यपाल रॉबर्ट चाल्मर्स के आदेश पर सेना अधिनियम के अधीन नागरिकों पर मुकद्दमे चलाये गये। पहला आरोप यह था कि “उपर्युक्त नामित अभियुक्तों (हेवावितारण तथा विजेसेकर) पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया है, उसमें उन्होंने 1 जून 1915 को अथवा उसके आसपास के दिन कॉलंबो में सेना अधिनियम की धारा 41 के विपरीत हमारे शासक, राजा के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की।”
गंपॉल इलाके के आसपास के मसजिद के बाहर ध्वनि विस्तारक के प्रयोग करने के संबंध में द्वीप के सिंहली तथा मुसलमानों के बीच जो कठोर मतभेद हुआ, कॉलंबो के दंगे निश्चित रूप से उसी की प्रतिक्रिया थे।
सिंहली लोगों की एक उत्तेजित भीड़ ने पेटा के केज़र गली में स्थित "क्रिस्टल पॅलस" नामक मुसलमान मालकियत की एक दुकान में ज़बरदस्ती घुसकर उसे लूट लिया था। हेवावितारण और विजेसेकर पर उस भीड़ के नेतृत्व करने का आरोप लगा दिया गया था।
अगले महीने ही कोर्ट मार्शल हुआ था। महान्यायवादी, ब्रिटिश शासन सत्ता की ओर से उपस्थित हुए। उस समय के दो वैध विद्वान, फ्रेड्रिक नोर्टन और एलन ड्रेबर्ग ने विपक्षी दल का नेतृत्व किया। दोनों पक्षों की कई गवाहों को सुनने के बाद केवल तीन दिनों की सुनवाई से अभियुक्तों को राजद्रोह के आरोप में दोषी ठहराया गया।
दुकान लूटने का आरोप हटाया गया और दोषियों को 'आजीवन कठोर कारावास' की सज़ा सुनायी गयी। 31 वर्ष की उम्र में मेरी दादी को विधवा छोड़कर 42 वर्ष की उम्र में मेरे दादा जी की मृत्यु हो गयी। अपने पिता जी को पहले वॉलिकड क़ैदख़ाने में, फिर जॅफ्ना के कैदखाने में बंदी बनते हुए देखकर और फिर कैदखाने में आंत्र ज्वर नामक तत्कालीन एक जानलेवा उष्णकटिबंधीय बीमारी से पीड़ित होते हुए देखकर उसे बहुत छोटी उम्र में दर्दनाक अनुभव का सामना करना पड़ा। जॅफ्ना के कैदखाने का 'अस्पताल' भी बस एक और कोठरी ही थी। वहाँ किसी के ध्यान और उपयुक्त इलाज के बिना, मरीज़ ज़मीन पर एक चटाई पर लेटा रहता है। जब असाध्य हो, तभी मरीज़ को सामान्य अस्पताल में भेजा जाता है।
उनकी मृत्यु के पाँच दिन पहले, औपनिवेशिक सचिव से एक याचिका दायर करने के बाद उनके भाई, सी. ए. हेवावितारण को अपने मरते हुए भाई की देखभाल करने की अनुमति प्राप्त हुई। किंतु तब बहुत देर हो चुकी थी। एक सेना अधिकारी के द्वारा 'कठोर कारावास' की सज़ा सुनाये जाने के पाँच महीने बाद 19 नवंबर 1915 को एडमंड हेवावितारण की मृत्यु हो गयी। उनकी अंत्येष्टि पर लोगों की बहुत बड़ी भीड़ जमा हुई और उन्होंने एक देशद्रोही का नहीं, बल्कि एक देशभक्त का सम्मान किया था।
एडमंड हेवावितारण के नाम को निर्दोष घोषित करने के लिए अनुरोध करते हुए उनकी विधवा, सुजाता हेवावितारण के द्वारा कृत 13 पन्नों का एक पुनरावेदन पत्र मल्लिका हेवावितारण (एडमंड और अनागारिक की माँ) प्रमुख बौद्ध भिक्षुओं तथा विभिन्न समुदायों की साधारण जनता के द्वारा कृत याचिका तथा शपथ-पत्रों के साथ उपनिवेश संबंधी राज्य सचिव, एन्ड्रो बॉनार के नाम पर लन्दन भेजा गया। याचिका पत्रों को परिपुष्ट किया गया। राज्यपाल, श्रीमान रॉबर्ट चाल्मर्स के.सी.बी. और पुरे सिलोन के प्रधान सेनापति को दंगों के गलत प्रबंधन करने के कारण ब्रिटेन वापस बुलाया गया था।
नये राज्यपाल, श्री हेनरी विलियम मॅनिंग ने ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से ब्रिटिश न्याय की विफलता के लिए श्रीमती एडमंड हेवावितारण से माफ़ी माँगी। वह और उसकी पतनी हेवावितारण परिवार के करीबी मित्र बन गये।