सक्रियतावादी, मिशनरी, आज़ादी लड़ाका, समाज सुधारक और त्यागी के रूप में अनागारिक धर्मपाल का जीवन अद्वितीय रहा।
जिस युग में पूरी दुनिया पर औपनिवेशिक बल और उनके सामाजिक-धार्मिक विचारों का शासन था, उस युग में उन्होंने पाश्चात्य जगत में गौतम बुद्ध के प्रवचन प्रसारित करने निकले थे। ऐसा प्रयास उससे पहले किसी और से नहीं किया गया था। उन्होंने बौद्ध धर्म को जनता के मन में पुनःप्रवर्तन करने के लिए उन्हीं विधानों और मानदंडों का प्रयोग किया, जिनका प्रयोग तद्युग के उपनिवेशवादी भी करते थे। वे समझ गये कि यह पुनःप्रवर्तन उनके समय और उस समय में प्रयुक्त साधन और शासक के अनुरूप होना चाहिए। जिस समय ईसाई रविवार स्कूल (संडे स्कूल) थे, उस सय कर्नल ओल्कॉट के साथ मिलकर उन्होंने बौद्ध रविवार स्कूलों का आरंभ किया। उन बौद्ध स्कूलों में उन्हीं आदर्शों का पालन किया गया था, जिनका पालन ईसाई मिशनरी के द्वारा उनके स्कूलों में किया गया था। साथ ही उन्होंने देशी वस्त्र पहनने और रीति-रिवाजों को स्वीकार करने में संकुचित हुए देशी लोगों को अपनी दृष्टियों को सुधारने की प्रेरणा दी। विशेषकर, उन्होंने बौद्ध धर्मियों को अपने-आप के महत्व और बौद्ध शिक्षाओं की विशिष्टता का बोध दिलाया।
वैश्विक दृष्टि अपनाने वाले अंतर्राष्ट्रीयतावादी के रूप में विश्व में बौद्ध समाज में बौद्ध दृष्टि जगाने के लिए उन्होंने महाबोधि परिषद की स्थापना की। वह परिषद ऐसा निशान हो गयी, जो सबसे पहले सभी बौद्ध-धर्मियों का प्रतिनिधित्व करती थी और विभिन्न महाद्वीपों के बौद्ध-धर्मियों को एकत्रित करती थी।
वे शारीरिक पीड़ा और कष्टों को सहते हुए ऐसे समय में यात्रा कर रहे थे, जब यात्रा करना आसान नहीं था। ऐसी यात्राओं के दौरान उन्होंने अपनी दृष्टि और अपने संदेश का प्रचार किया और अमेरिका और यूरोप में स्थित अपने समय के मुख्य संस्थानों में प्रवेश करके शिक्षा और औद्योगिक प्रशिक्षण से संबंधित नवीनतम ज्ञान लेने का प्रयास किया। उसके फलस्वरूप वे तत्कालीन मुख्य विचारकों और सक्रियतावादियों से मिलकर परस्पर प्रभावित होते थे। उन विचारकों में से भारते के स्वामी विवेकानंद, टैगोर एवं गांधी, रंगून, सियम एवं जापान के राजा से नेता तक के शासक, इंग्लैंड के राइस डेवीड्स, श्री. एडविन आर्नल्ड आदि विद्वान और अमेरिका के चिकागो विश्वविद्यालय के संस्थापक अध्यक्ष विलियम रैनी हार्पर आदि शिक्षाविद प्रमुख थे। धर्मपाल जी संचार, स्वास्थ्य सेवा और उत्पाद के लिए तकनीकी का महत्व तुरंत समझते थे। अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए प्रकाशन, अनुवाद, शिक्षा और खासकर अंतःसमाजीय एवं अंतर-समाजीय संवादों का महत्व समझते थे। अनागारिक धर्मपाल के बहुआयामी काम और स्वभाव ने विभिन्न आख्यानों को जगह बना दी और उनसे समकालीन समाज के कुछ व्यक्तियों को प्रायः मूल स्रोत से प्रमाणित किये बिना उनकी दृष्टि या उनके व्याख्यान को विकृत करने की जगह भी मिली। कुछ लोगों ने धर्मपाल जी के व्याख्यान और लेखन का उल्लेख जातिवाद के समर्थन करने के लिए किया है। वास्तव में उन्होंने सच्चे महत्व और नेक उद्देश्य की अवहेलना की है।
अनागारिक धर्मपाल संगठन विशेषतः जातीय और धार्मिक द्वेष को उत्तेजित करने वाले अविश्वसनीय स्रोत से उद्धृत सामग्री, अशुद्ध उद्धरण, अपूर्ण और अप्रसंगिक उद्धरण और/या अशुद्ध रूप में किये गये संक्षिप्त विवरण आदि को क्षमा नहीं करता और किसी प्रकार उनकी सहायता नहीं करता। जो संपदा अनागारिक धर्मपाल श्री लंका और विश्व की भावी पीढ़ियों को देना चाहते थे, उनके द्वारा स्थापित धर्मपाल संगठन के उद्देश्यों से प्रकट होती है। धर्मपाल जी के नेक कामों को जारी रखना संगठन का अभिप्राय है।
अनागारिक धर्मपाल ने एक ऐसी दुनिया बनाने की कल्पना की, जहाँ महात्मा बुद्ध की शिक्षा का व्यापक बोध हो, उस महान कार्य के लिए अपने जीवन को समर्पित करनेवाले ही रहें और बेहतर स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और औद्योगिक प्रशिक्षा आदि से दलितों की उन्नति हो।
अनागारिक धर्मपाल जी की वसीयत-संपदा वह थी, जिसे उन्होंने भावी पीढ़ियों को छोड़ना चाहा।