अनागारिक धर्मपाल का जीवन

(17th of September 1864 – 29th of April 1933)

बोध गया से संबंधित संघर्ष

‘बोध गया' या ‘बुद्ध गया’ भारत के उत्तर पूर्वी दिशा के बिहार राज्य के 'गया' ज़िले से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसे यह नाम इसलिए मिला है कि राजा शुद्धोदन के पुत्र राजकुमार सिद्धार्थ ने अपने राजकीय जीवन का त्याग करके तपस्वी बनकर वर्षों के प्रयास और समाधि के बाद महान ज्ञान की प्राप्ति कर ली। दुनिया के लगभग 300 मिलियन बौद्ध भक्तों के लिए यह पवित्रतम तीर्थ स्थल है। बोध गया का उद्धार अनागारिक धर्मपाल के लिए लगभग 20 साल की उम्र से लेकर अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य था।

सम्राट अशोक ने गौतम बुद्ध की पूजा के लिए जो मंदिर बनवाया, वह बुद्ध के परिनिर्वाण से कुछ सदियों के बाद देखने पर क्षय होता जा रहा था। उस पवित्र स्थल का शासन बलवान देशी 'महंत’ (हिंदू धार्मिक नेता) के अधीन था। धर्मपाल ने बोध गया को 'बौद्ध यरुशलम' भी कहा। ऐसे कहने से उन्होंने बौद्ध भक्तों के लिए इसका इतना महत्व बता दिया, जैसा कि यहूदी भक्तों के लिए ज़ियोन है और इस्लाम भक्तों के लिए मक्का है।

यह व्यंग्य की बात है कि बोध गया को फिर से खोजने का कार्य ब्रिटिश औपनिवेशिक शासक के द्वारा संपन्न हुआ। भारत में बौद्ध स्थलों की खोज ने ही युवक धर्मपाल को जागृत करके बोध गया के प्रति उनका ध्यान आकृष्ट कर दिया।

19 वीं सदी के आरंभ में (1809 में) फ्रांसिस बुकानन नामक एक स्कोटिश शल्य-चिकित्सक ने बोध गया को फिर से खोज लिया। उसने उस इलाके में हिंदू और बौद्ध कलाकृतियों का उल्लेख किया था। उस सदी के अंत तक ही ब्रिटिश सैन्य अभियंता आलेक्सैन्डर कनिंगहैम के नेतृत्व से ब्रिटिश पुरातत्वविदों ने ‘बौद्ध भारत’ की खोज की। उन पुरातत्वविदों ने उन स्थलों का नक्शा बना दिया और अपनी खोज के लिए आदिकाल के चीनी तीर्थ यात्री फाहियान और हुएनसान के लेखों का सहारा लिया, जिनका अनुवाद यूरोपीय भाषाओं में हुआ था। औपनिवेशिक सरकार ने भारत में पुरातात्विक सर्वेक्षण का आरंभ कर दिया और तक्षिला, नालंदा, सारनाथ, सांची, लुम्बिनी और बोध गया में खुदाई आरंभ कर दी। उन्होंने प्राचीन भारत में बौद्ध धर्म के प्रभाव को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त प्रमाण भूमि से निकाले। उनमें से बड़ी मात्रा के इतिहास की खोज भारतीय सम्राट अशोक ने भारत के उपनिवेश बनने से पहले की थी लेकिन पूर्व-औपनिवेशिक युग में हिंदू और इस्लाम धर्मों के बीच में प्रमुख धर्म के रूप में उभरने के लिए हुए संघर्ष के कारण वह खोज जनता के ध्यान से दूर होकर विस्मृति में पड़ गयी।

जिस समय कनिंगहैम की खोज सामने आ गयी, उस समय अंग्रेज़ी लेखक श्री. एडविन आर्नल्ड द्वारा महात्मा बुद्ध के जीवन के आधार पर रचित ‘द लाइट ऑफ एसिया’ नामक काव्य का, युवक धर्मपाल के उद्देश्यों पर बड़ा प्रभाव पड़ गया। उन्होंने बाद में कहा था कि वह काव्य उनकी आँखों को भराने में सक्षम था। वे कोलंबो के ‘विक्टर हाउस’ (अब धर्मपाल बालिका विद्यालय का स्थान) में अपने पलंग से उठकर रत से अलग करने वाली संकीर्ण ‘पोक जलसंधि’ को पार करके अविलंब भारत के पवित्र स्थल तक पहुँचे। उस वक्त वे भिक्षु कॉज़ेन गुणरतन और तॉकुसावा नामक दो जापानी भिक्षुओं को अपने साथ ली गये। वे दोनों भिक्षु धर्मपाल के ओलकॉट के साथ जापान जाने के बाद सिलोन (लंका) पधारे थे। वे मद्रास (अद्यतन चेन्नई), बॉम्बे (अद्यतन मुंबई) और बनारस से होकर 22 जनवरी 1891 को बोध गया पहुँचे।

अब धर्मपाल जी बोध गया पहुँचे थे, तब सम्राट अशोक द्वारा बनावाया गया मंदिर अत्यंत नष्ट हो चुका था। हिंदू और बौद्ध दोनों उसकी पूजा की, लेकिन छोटी संख्या में। बर्मा (अद्यतन मियनमार) के राजा वहाँ से उसकी यात्रा के लिए आ गये बौद्ध भक्तों की भक्ति के लिए ज़िम्मेदार थे। कभी-कभी तिब्बती बौद्ध भक्त भी बोध गया आते थे। वहाँ बर्मी विश्रामशाला थी। अपितु वहाँ के मंदिर का नियंत्रण हिंदू महंत के हाथों पर था, जिसका शानदार महल बगल की भूमि पर स्थित था। उसने बौद्ध भक्तों को मंदिर की पूजा करने का अवकाश दिया।

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बौद्धों के लिए पवित्रतम तीर्थ स्थल में स्थित मंदिर का तिरस्कृत होकर नष्ट होना और हिंदू पुजारी के अधीन होना देखकर धर्मपाल जी ने पवित्र बोधि वृक्ष के तले ऐसा वादा किया कि अपनी पूरी शक्ति को बोध गया के अधिकार और नियंत्रण को फिर से बौद्ध धर्मियों के लिए दिलाने के लिए एकत्रित कर लूँ। यह बोधि वृक्ष उस महान बोधि वृक्ष का अंकुर था, जिसके तले गौतम बुद्ध ज्ञान प्राप्ति से पहले समाधि में लीन रहे।

हिंदुओं का एक विश्वास था कि बुद्ध भी विष्णु का एक अवतार है। इसलिए उन्होंने भी महात्मा बुद्ध की प्रतिमाओं की पूजा की। बुद्ध की प्रतिमाओं को हिंदू देव के समान वेशभूषा से सज्जित करके हिंदू प्रथाओं के अनुकूल माथे के मध्य में तिलक भी लगाया गया था। धर्मपाल जी ने एक लेख में लिखा था, “यह एक अत्याचार जैसा है कि बौद्ध धर्मियों का यह पवित्रतम मंदिर एक ऐसे आदमी के नियंत्रण में है, जिसके पूर्वज हमेशा बौद्ध धर्म के खिलाफ रहे।” यह लेख धर्मपाल जी के द्वारा उनकी प्रथम बोध गया यात्रा से चौबीस साल बाद, यानी 1891 में तदयुगीन समाज को बौद्ध धर्म की याद दिलाने के लिए लिखा गया था। वापस सिलोन (लंका) आने के बाद उसी वर्ष में धर्मपाल जी ने हिंदू नियंत्रण से बोध गया के उद्धार के उद्देश्य से महाबोधि परिषद की स्थापना की। वे अपने तीखे स्वर से “सिंहलयिनि नॅगिटिव! बुद्धगयाव बेरागनिव!” (हे सिंहली, खड़े हो जा! बोध गया को बचा ले!) का नारा लगाते हुए सिलोन (लंका) की चारों ओर घूमने लगे। उन्होंने चार बौद्ध भिक्षुओं को बोध गया के बर्मी विश्रामशाला में रहने के लिए भेज दिया।

धर्मपाल जी महाबोधि परिषद की स्थापना के बाद फिर बोध गया चले गये। उनके कठोर आंदोलन के कारण उन्हें कभी शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ा। वे कुछ अन्य लोगों के साथ दूसरी बार बोध गया पहुँचे थे। उनके द्वारा लायी गयी बौद्ध प्रतिमा को जब उस इमारत की दूसरी मंज़िल में स्थापित करने का प्रयास किया गया था, तब महंता के सेवक बलपूर्वक घुसने का आरोप लगाकर उन भिक्षुओं को पीटने निकले थे। वह बुद्ध प्रतिमा धर्मपाल जी जापान से आते समय अपने साथ लेकर आये थे।

उस समारोह में बाधा पहुँचाने के कारण धर्मपाल महंत और उनके सेवकों को अदालत तक ले गये। तब से ‘द ग्रेट केस’ (बड़ा मामला) आरंभ हुआ। दोनों पक्षों की ओर से अंग्रेज़ी वकील उपस्थित हुए। ज़िलाधिकारी धर्मपाल के पक्ष में थे। महंत के सेवक विधिविरुद्ध जमाव के लिए दोषी ठहराये गये। अपने आदेश की घोषणा करते समय ज़िलाधिकारी ने मंदिर को बौद्ध मंदिर के रूप में माना। यह बोध गया संघर्ष का पहला धमाका था। ज़िलाधिकारी के आदेश के विरुद्ध महंत ने अंग्रेज़ी वाले ज़िला कलेक्टर के सामने अपील की और हार गये। उन्होंने फिर कलकत्ता उच्च न्यायालय के सामने अपील की, जिसमें एक अंग्रेज़ी और एक बंगाली न्यायाधीश थे।

अंत में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने धर्मपाल के विरुद्ध निर्णय देकर महंत के सेवकों को छोड़ दिया। उस निर्णय के अनुसार मंदिर ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के अधीन था और उसके प्रबंधकीय अधिकार महंत के पास थे। इससे विचलित न होकर धर्मपाल जी ने दूसरा कदम उठाया। वह था, महंत से मंदिर के पास की भूमि को खरीद लेना। महंत ने वह प्रस्ताव मना कर दिया। धर्मपाल ने फिर गया से भूमि खरीद ली, जो वहाँ से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। उसी प्रकार उन्होंने कलकत्ता और सारनाथ के बौद्ध स्थल की भूमि के लिए कानूनी दावा करना आरंभ किया।

उस मुकदमे के दौरान धर्मपाल जी बोध गया से संबंधित अनेक व्यापारों में व्यस्त रहे लेकिन मंदिर के अधिकार से संबंधित नेक संघर्ष में कभी नहीं हटे। वे जहाँ भी थे, वहाँ से उस युग के प्रभावशाली व्यक्तियों की सहायता लेते थे। उन्होंने ब्रिटिश राजप्रतिनिधि, यूरोप और अमेरिका के विद्वान, भारतीय देशभक्त और समर्थक आदि से लिखे। उन्हें उस समय के औपनिवेशिक भारत की राजधानी कलकत्ता के बंगाली संभ्रांत वर्ग की सहायता भी मिली। इसी दौरान नवस्थापित महाबोधि परिषद ताइलैंड और जापान के राजवंशों की सहारा लेने में सक्षम बना। साथ ही महाबोधि परिषद की प्रेरणा के साथ सिलोन (लंका) की जनता में जागृति हुई और भारत के बौद्ध-धर्मियों के अधिकार के प्रति प्रबल आवाज़ उठाई गयी। अंतर्राष्ट्रीय तौर पर बोध गया को बौद्ध धर्म का प्रतीक माना गया और मंदिर के प्रबंधकीय अधिकार लेने की उत्तेजना विश्व भर होने लगी।

तद्पश्चात 1920 के दशक में धर्मपाल जी बौद्ध धर्म लेकर पश्चिम की ओर चले। तब तक सिवाय कुछ विद्वान, बौद्ध धर्म का अध्ययन करने वाले थोड़े थे। बोध गया का अधिकार बौद्ध-धर्मियों को लेने की नींव रखी गयी थी। उन्होंने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, राजेंद्र प्रसाद और बी. आर. अंबेडकर आदि भारत की अगली पीढ़ी के नेता में बोध गया का अधिकार बौद्ध-धर्मियों को लेने के महत्व की धारणा बोयी।

अपने जीवन के अंतिम समय में बौद्ध भिक्षु बनकर उन्होंने महाबोधि परिषद से यह आग्रह किया कि बोध गया से संबंधित संघर्ष जीतने तक जारी रखे। 1933 में धर्मपाल जी का देहांत हो गया। तब भी भारत उपनिवेश ही था और ‘बोध गया की समस्या’ का समाधान नहीं हुआ था। फिर भी महाबोधि परिषद के द्वारा धर्मपाल जी के अनवरत व्यापार को जारी रखा गया। ब्रिटिश उपनिवेश से स्वतंत्र होने से दो साल बाद स्वतंत्र भारत सरकार ने ‘बोध गया मंदिर अधिनियम, 1949’ को प्रस्तुत किया, जिससे बोध गया मंदिर का स्वामित्व अधिकार बिहार सरकार को और मंदिर का संचालन हिंदू और बौद्ध दोनों पार्श्वों में समान रूप में बाँटकर करने को आदेश मिला था। हिंदू और बौद्ध सदस्यों की इस प्रबंधन समिति के सभापति ज़िलाधिकारी रहे, यद्यपि वे हिंदू नहीं थे।

1978 में श्री लंका के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री जे. आर. जयवर्धन ने महाबोधि मंदिर तक जाने वाले मुख्य रास्ते को अनागारिक धर्मपाल के नाम से अभिहित कर दिया। 2002 में UNESCO ने बोध गया को विश्व धरोहर स्थल घोषित कर दिया।

अब मुख्य मंदिर से थोड़ी दूरी पर भिक्षुओं एवं यात्री के लिए महाबोधि परिषद द्वारा नियंत्रित विश्रामशाला है, जो 20 वीं सदी में विवाद का विषय बन गयी थी। उसके साथ कई बौद्ध मंदिर और अन्य बौद्ध देशों के यात्री के लिए विश्रामशालाएँ मुख्य मंदिर के पास स्थित हैं।

भगवान बुद्ध की पूजा करने के लिए दुनिया की हर तरफ़ से आने वाले हज़ारों बौद्ध तीर्थ यात्रियों की सुविधा के लिए हाल में भारत सरकार ने बोध गया में एक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का उद्घाटन किया।