अनागारिक धर्मपाल का बहुमुखी व्यक्तित्व था। उन्होंने कई कार्यों में साथ-साथ काम किया। इसलिए, उन्हें एक-विमीय पहचान देना बहुत आसान है और अप्रासंगिक तरीके से उनके शब्दों को अशुद्ध अर्थ भी लगाये जा सकते हैं। परंतु ऐसा करना उनके प्रयत्नों का अनदेखा करता है कि वे औपनिवेशिक बल के अधीन रहे जटिल विश्व की ओर से आयी असंगत समस्याओं एवं अपने प्रति आये विरोध का प्रत्युत्तर दे रहे थे।
मुझे और अन्य प्रबंध न्यासी को यह गर्व की बात है कि हम उनकी संपदा के न्यासी के रूप में, उनके द्वारा कल्पना किये गये कार्यों को जारी रखने में सक्षम हुए हैं। अनागारिक धर्मपाल संगठन जातीय और धार्मिक द्वेष को उत्तेजित करने वाले अविश्वसनीय स्रोत से उद्धृत की गयी सामग्री, अशुद्ध उद्धरण, अपूर्ण और अप्रासंगिक उद्धरण और/या अशुद्ध रूप में किये गये संक्षिप्त विवरण आदि को क्षमा नहीं करता और किसी प्रकार उनकी सहायता नहीं करता।
अनागारिक धर्मपाल की आंतरिक आकांक्षा आध्यात्मिक विकास थी। उसके लिए उन्होंने खड़ी मेहनत की; साधना के अभ्यास के लिए सुबह उठते थे और अंत में बौद्ध भिक्षु बनने के लिए उन्होंने अपना जीवन अनागारिक (बेघरवाला) के रूप में भी समर्पित कर दिया। उन्होंने ऐसा दृढ़ संकल्प किया :
“जन्म से जन्म तक मेरा जीवन मानवता के नाम पर समर्पित होगा। मैं पारमिता का अभ्यास करूँगा। मैं दुनिया का उद्धार करूँगा। मैं भावी बुद्ध से ‘विवरण’ (समर्थन) लूँगा।”
अनागारिक धर्मपाल जी की आकांक्षाएँ पूरी हों!
सुधम्मिक हेवावितारण
अध्यक्ष
श्री लंका की जनता के हित के लिए जीवन भर सक्रिय रूप में काम करके, विश्व भर के बौद्ध-धर्मियों को एकत्रित करके और बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार करके, प्रौढ़ उम्र में सन्यासी जीवन का परित्याग करके बौद्ध भिक्षु बनने के बाद अनागारिक हेवावितारण धर्मपाल ने अपने द्वारा शुरू किये गये कार्यों को अविरत बनाने की इच्छा से अपनी सारी निजी संपत्ति और इनाम जो अनेक पार्श्वों द्वारा उन्हें मिले थे, उन सबको अनागारिक धर्मपाल संगठन नामक संगठन को हस्तांतरित कर दिया। संगठन के विलेख को 29 नवंबर 1930 को अनागारिक धर्मपाल के द्वारा कोलंबो में हस्ताक्षर किया गया और लोक लेख्य प्रमाणक जूलियस और क्रीसि के द्वारा साक्ष्यांकन किया गया। संगठन के प्रथम न्यासी के रूप में अपना नाम आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने बड़ी सूक्ष्मता से अपने नामनिर्देशिती को चुन लिया। संगठन के उद्देश्यों को समाचार पत्रों के द्वारा जनता को घोषित करा दिया गया।
संगठन के उद्देश्यों में कई अंश सामने आते हैं। अनागारिक धर्मपाल ने ऐसी कल्पना की है कि संगठन महाबोधि परिषद के कार्यों के माध्यम से बौद्ध धर्म के संबंध में उनका जो लक्ष्य था, आगे भी उसका पुनः प्रवर्तन करे। बौद्ध मंदिरों का संरक्षण करना, अनाथालयों की सहायता करना, गरीबों के जीवन की उन्नति के लिए समाज-सेवा गतिविधियों में भाग लेना, पत्रिकाओं का प्रकाशन, पाली लेखों का प्रसार और उनका देशी भाषाओं में अनुवाद करना आदि कार्य उसमें अपेक्षित हैं। उन्होंने बौद्ध कला-शिल्पों के पुनरुद्धार पर ज़ोर दिया और नालंदा के प्राचीन विश्वविद्यालय के संप्रदाय के विश्वविद्यालय की स्थापना करके उस प्रकार के शिक्षा-केंद्रों के पुनःप्रवर्तन का भी महत्व बताया। उन्होंने पंडित भिक्षु और शोधकर्ता के माध्यम से पूर्वी एवं पश्चिमी जगत के बीच विचारों के आदान-प्रदान बनाये रखने की कल्पना भी की।
वे यह भी चाहते थे कि स्कूलों, व्यापार और औद्योगिक स्कूलों की स्थापना से युवकों में सामाजिक अध्ययन और व्यावसायिक कौशल का बढ़ावा हो। वे यह भी बताते थे कि उनमें शिक्षा लेने का अवसर लिंग-भेद के बिना होना चाहिए। वह उसका प्रमाण है कि वे किसी भी व्यवसाय के लिए औरतों की शिक्षा एवं व्यावसायिकता के शुरुआती समर्थकों में से एक थे। संगठन के न्यासी के द्वारा भावी न्यासी का नियुक्त करना अपेक्षित था और 1947 में श्री लंका सरकारी लोक न्यासी को अनागारिक धर्मपाल संगठन के पदेन संरक्षक न्यासी के रूप में अभिहित किया गया।
अनागारिक धर्मपाल संगठन भिक्षुओं को धम्मदूत सेवा में नियुक्त करके गौतम बुद्ध के संदेश को भारत, ब्रिटिश और अन्य देशों तक पहुँचाते हुए अनागारिक धर्मपाल के कार्यों को जारी रखने का ज़िम्मेदार है। वह श्री लंका, भारत और ब्रिटेन की महाबोधि परिषदें, उनके द्वारा संचालित विहार, केंद्र और विश्रामशालाएँ आदि की सहायता भी करता है। श्री लंका में वह कोलंबो में एक आयुर्वेदिक अस्पताल का संचालन करता है; बौद्ध मंदिरों के लिए धन-संबंधी सहारा देता है; श्रामणेर भिक्षुओं के लिए शिक्षा कार्यक्रमों का प्रबंध करता है; अनाथालय और स्कूलों का संचालन करता है; बौद्ध साहित्य की छपाई और उसका प्रकाशन करता है और संगठन के विलेख में अंतर्गत विषयों का कार्यान्वयन करता है।
धार्मिक कार्य और शिक्षा के संबंध में श्रामणेर भिक्षुओं की सहायता करना
धम्मदूत सेवा (बौद्ध मिशनरी) के लिए भिक्षुओं का प्रशिक्षण करना और उन्हें विदेशी केंद्रों में नियुक्त करना.
विदेशों में स्थित बौद्ध मंदिरों में और महाबोधि परिषद की गतिविधियों में संगठन का प्रतिनिधित्व करना.
अभावग्रस्त रोगियों को निःशुल्क आयुर्वेदिक चिकित्सा उपचार करना.
ग्रामीण बौद्ध मंदिरों की मरम्मत करना
पुस्तकों का प्रकाशन करना और अप्राप्य प्रकाशनों की प्रतिकृति बनाना.
संगठन के प्रकाशन को धम्म स्कूलों एवं बौद्ध-धर्म के अध्ययन के इच्छुक व्यक्तियों को दान करना.
कोलंबो के संगठन के मुख्यालय में स्थित अनागारिक धर्मपाल अनुसंधान केंद्र का संचालन करना.
भिक्षुओं को दान देना .
संगठन के सहयोगी के द्वारा अनाथ बालकों के लिए स्थापित निवासी देखभाल केंद्रों की सहायता करना
शिक्षा एवं समाज सेवा संबंधी गतिविधियों में माध्यमिक स्कूलों की सहायता करना
संगठन का निरीक्षण छः सदस्यों के मण्डल के द्वारा किया जाता है। वे हैं,
वह अनागारिका धर्मपाल के पड़पोते हैं और श्रीलंका सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय में कंसल्टेंट कम्युनिटी फिजिशियन हैं।
राष्ट्रपति के सलाहकार और कोलंबो के युवक बौद्ध परिषद (YMBA) के निदेशकमंडल का सदस्य है।
अभियांत्रिकी सलाहकार और I-Vation का मुख्य कार्यपालक अधिकारी (CEO) है। उसे अभियांत्रिकी की विद्यावाचस्पति (PhD) उपाधि है।
अनागारिक धर्मपाल के भाई एडमंड हेवावितारण का परपोता है। ‘टी सिलेक्ट प्राइवेट लिमिटेड’ का प्रबंध-निदेशक है।
अनागारिक धर्मपाल के भाई एडमंड हेवावितारण का परपोता है और महाबोधि परिषद का आजीवन सदस्य है। ‘एच. दॉन करोलिस और पुत्र’ उद्योग का पूर्व अध्यक्ष और प्रबंध-निदेशक था।
संगठन का अध्यक्ष है, अनागारिक धर्मपाल के भाई चार्लस हेवावितारण का परपोता है और महाबोधि परिषद का आजीवन सदस्य है। कुछ समय के लिए ‘एच. दॉन करोलिस और पुत्र’ उद्योग का पूर्व प्रबंध-निदेशक था।
महाबोधि परिषद का आजीवन सदस्य है। ब्रिटेन की महाबोधि परिषद का सदस्य है और भारत की महाबोधि परिषद का न्यासी और उपाध्यक्ष है। वह ‘विजय समाचार पत्र लिमिटेड’ (Wijeya Newspapers Limited) का कार्यकारी निदेशक और ‘संडे टाइम्स’ (Sunday Times) समाचार पत्र का मुख्य संपादक है। वकील भी है।
| न्यासी का नाम | अवधि का आरंभ | अवधि का अंत |
|---|---|---|
| एन. दॉन स्टेफन सिल्वा | 01.12.1930 | 19.05.1942 |
| नील हेवावितारण | 01.12.1930 | 19.05.1942 |
| राजसिंह हेवावितारण | 01.12.1930 | 19.05.1942 |
| एस. के. मुणसिंह | 01.12.1930 | 19.05.1942 |
| यू. बी. दॉलपिहिल्ल | 01.12.1930 | 19.05.1942 |
| जे. आर. जयवर्धन (एकमात्र प्रबंध न्यासी) | 25.05.1942 | 30.09.1954 |
| एच. डब. अमरसूरीय | 30.09.1954 | 06.03.1981 |
| नलिन मुणसिंह | 30.09.1954 | 31.07.1974 |
| आर. ए. रत्नपाल | 30.09.1954 | 27.11.1957 |
| मुदलियर पी. डी. रत्नतुंग | 30.09.1954 | 27.11.1957 |
| गामणी एन. जयसूरीय | 27.11.1957 | 30.11.1995 |
| पी. उपजीव रत्नतुंग | 27.11.1957 | 31.07.1974 |
| विमलधर्म हेवावितारण | 27.11.1957 | 06.03.1981 |
| ललित के. हेवावितारण | 07.05.1968 | 03.05.1984 |
| सिंह वीरसेकर | 01.08.1974 | 25.02.2002 |
| नंद अमरसिंह | 01.08.1974 | 18.05.1995 |
| नोयेल विजेनायक | 14.08.1981 | 04.11.2014 |
| प्रसन्न जयसूरीय | 01.12.1995 | 06.01.2015 |
| अनिल मुणसिंह | 16.02.1999 | 14.09.2000 |