(20 सितंबर 1844 - 29 दिसंबर 1930)
मेरि एलिज़बेत मिकहला रॉबिन्सन का जन्म 20 सितंबर 1844 को हॉनॉलुलू में हुआ था। उसके माता-पिता थे, जोन जेम्स रॉबिन्सन, जो एक डूबे हुए जहाज़ के अंग्रेज़ नाविक थे और रेबेका कैकिलानी प्रिवेर, जो प्रसिद्ध हवाईयन राजा प्रथम कमेहमेहा के वंश की थी। इस प्रकार मेरि, रानी लिल्योकलानी से भी संबंधित थी, जो उससे छः साल बड़ी थी और राजा के सबसे करीबी मित्रों में से एक थी। 1860 में मेरि रॉबिन्सन ने नोवा स्कोटिया के थोमस आर. फ़ॉस्टर (1835 - 1889) से शादी की, जो तीन साल पहले ही द्वीप में आया था। उसने एक अंतर्द्वीप भाप-नौपरिवहन उद्योग की स्थापना की और वह एक पोत कारखाने, एक नौपरिवहन और कई द्विकूपी नावों का मालिक था। 1889 में उसकी मृत्यु हो गयी और मेरि एक धनवान विधवा हो गयी। 1876 में उसके पिता की मृत्यु के बाद उसे उनसे भी विरासत में भरपूर संपत्ति प्राप्त हुई थी। उसके पति की मृत्यु के बाद मेरी ब्रह्मविद्या में रूचि रखने लगी और 12 मई 1882 को ब्रह्मविद्या संग में शामिल हो गयी। प्रारंभिक समय में वह सैन फ्रांसिस्को के गोल्डन गेट शाखा में सदस्य थी और उसने जल्द ही होनोलूलू में व्याख्यानों तथा कक्षाओं का आयोजन किया। 1894 में उसने अलोहा की शाखा के आयोजन में सहायता दी।
अनागारिक धर्मपाल के पिता की मृत्यु के बाद मेरि फोस्टर उनकी प्रमुख संरक्षक बन गयी। उसने उनके अनेक कार्यवाहियों तथा विशेष कार्यों के लिए अपनी संपत्ति की वृहद् धनराशि को समर्पित किया। उनकी मुलाकात 1893 में हुई, जब 1893 में धार्मिक संसद के उद्घाटन के बाद जापान से होकर श्री लंका लौटते समय 'दि ओशनिक' नामक अनागारिक धर्मपाल का भाप जहाज़, होनोलूलू (हवाई में) रुका था। वही से एक मित्रता शुरू हुई, जो 40 सालों तक चली थी। यह संभव है कि एक ब्रह्मविद्यावादी होने के कारण, उनके मिलने के बहुत पहले से ही अनागारिक के काम और उनके लेख आदि से मेरी परिचित थी। ऐसा कहा जाता है कि उसने अपने पति की मृत्यु के बाद उत्पन्न दुःख और संभवतः हवाइयन राजतंत्र की पदच्युति के कारण उत्पन्न क्रोध के कारण अपने मन में जो संघर्ष था, उसके बारे में उन्हें बतायाा। अनागारिक धर्मपाल ने उसे बौद्ध चिंतन/ ध्यान अभ्यास करने का मार्गदर्शन दिया। इससे बौद्ध धर्म के समर्थन में उसकी आजीवन रूचि जागृत हुई। विशेषतः तथा अंशतः उसने भारत के सारनाथ में मूलगंध कुटी के निर्माण के लिए वित्तीय सहायता दे दी। जैसे कि अनागारिक धर्मपाल अपनी दैनिकी में लिखते हैं, यद्यपि बोधि का बीज उनके पिता के द्वारा उनके अंदर स्थापित किया गया था, और उनकी माँ ने उन्हें अस्थायित्व के सिद्धांत की शिक्षा दी, तथापि उनके पिता की मृत्यु के बाद उनका समर्थन मेरि फोस्टर ने किया था। उनका यह विश्वास था कि यह धम्म की शक्तियों का कार्य था। : "धम्म के अलावा कुछ भी उत्कृष्ट नहीं है। धम्म का यथातथ्य पालन करना मेरा सिद्धांत रहा है। धम्म मेरी रक्षा करता है। धम्म ने मुझे श्रीमती फॉस्टर के साथ संपर्क में लाया था।"
1913 में आनागारिक धर्मपाल ने मेरि फोस्टर को सिलोन के अनुराधपुर में स्थापित श्री लंका के श्री महाबोधि वृक्ष की एक शाखा उपहार में दी, जो उसी बोधि वृक्ष की साक्षात शाखा थी, जिसके नीचे भगवान् बुद्ध ने बुद्धत्व को प्राप्त किया था। उसके बगीचे में जो पेड़ लगाया गया, उसमें से कई बोधि वृक्षों को हवाई के बौद्ध मंदिरों के बगीचों को तथा हवाई के विश्वविद्यालय-मनोवा विश्ववविद्यालय को प्रदान किया गया था। 1930 में उसकी मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति को होनोलूलू शहर को उसके प्रथम वनस्पति उद्यान- ‘फॉस्टर वनस्पति उद्यान’ के रूप में उत्तरदान किया गया था। वर्तमान में वह बोधि वृक्ष उद्यान में नुउवानु दरिया के पास फल-फूल रहा है।
मेरी फॉस्टर ने मंदिरों की स्थापना के लिए, भारत तथा सिलोन के बौद्ध मंदिरों की मरम्मत के लिए, दक्षिण एशिया तथा हवाई के बहुसंख्यक स्कूलों, अस्पतालों, और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए वित्त पोषण प्रदान किया था। कुछ गणनाओं के अनुसार बौद्ध धर्म संबंधी कार्यवाहियों के लिए उसने वर्तमान मानकों के अनुसार 10 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक धन दान दिया है। ये कुछ परियोजनाएँ हैं, जिनका समर्थन उसने किया है :
· भारत के सारनाथ में मूलगंध कुटी की स्थापना · कॉलंबो के पास राजगिरिय में निःशुल्क अंग्रेजी-सिंहली स्कूल · हेवावितारण कपड़े की बुनाई का स्कूल · कॉलंबो में महाबोधि मुद्रणालय और सिंहली तथा अंग्रेजी में उसकी पत्रिकाएँ · सारनाथ में औद्योगिक विद्यालय · गरीबों के लिए फॉस्टर-रॉबिन्सन अस्पताल - एक निःशुल्क आयुर्वेदिक अस्पताल · भारत के कलकत्ता में धर्मराजिक विहार · 24 जुलाई 1926 को एशियाई महाद्वीप के बाहर स्थापित सर्वप्रथम प्रचारक विहार के रूप में लंदन, ईलिंग के 86, मॉडेली रोड में उद्घाटित एक पालनगृह। इसने ब्रिटिश महाबोधि परिषद् के निर्माण को भी चिह्नित किया था।
1925 में मेरि फोस्टर तथा अनागारिक धर्मपाल आखिरी बार मिले थे। अनागारिक धर्मपाल की अभिलाषा के अनुसार प्रतिवर्ष इसके जन्मदिन पर अनागारिक धर्मपाल संगठन के द्वारा बौद्ध भिक्षुओं को भिक्षा दान दी जाती है। 2019 में अनागारिक धर्मपाल के 155वे जन्म स्मरणोत्सव के अवसर पर लंदन बौद्ध मंदिर ने मंदिर की शाला में मेरि फोस्टर के एक चित्र का अनावरण किया था।