(1875 से 1913 तक)
अनागारिक धर्मपाल के दूसरे छोटे भाई, साइमन ने अपनी युवावस्था से ही बौद्ध विद्वत्ता के प्रति एक गहरी भक्ति तथा एक कलात्मक और संवेदनशील स्वभाव दिखाया। उसने रोयल कॉलेज (तत्कालीन कॉलंबो अकादमी) में चित्रकला में उत्कृष्टता दिखायी और राष्ट्रीय चित्रकला प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। कृषि विज्ञान में उसकी रूचि ने नवीनतम कृषि तकनीकों को प्रवर्तित करके सिलोन के अल्पाधिकार प्राप्त लोगों के आर्थिक पुनरुद्धार में योगदान देने के उद्देश्य से इंग्लैंड में इसी क्षेत्र में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया था।
वह उन सभी बौद्ध पुनरुद्धार आंदोलनों में और संस्थाओं में एक सक्रिय सदस्य था, जिनमें उसके भाई, अनागारिक एक अग्रणी भूमिका निभा रहे थे और उसके पिता और दूसरे भाई भी शामिल थे। इनमें कॉलंबो मद्यनिषेध आंदोलन, महाबोधि परिषद्, युवा बौद्ध संघ, विद्यादर सभा और ब्रह्मविद्या संग अंतर्गत हैं। उसने त्रिपिटक (बौद्ध धर्म ग्रंथों की तीन पिटक) का अनुवाद और प्रकाशन आरंभ किया, किंतु उसका स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण वह 49 पुस्तक खंडों के संकलन और प्रकाशन करने में असमर्थ रहा। साइमन को एहसास हुआ कि उसका जीवन ख़तम हो रहा है और उसने एक वसीयत लिखी, जो दुनिया में बौद्ध विद्वत्ता के पुनःप्रवर्तन के प्रति उसकी भक्ति और दिलचस्पी को दर्शाती है।
साइमन हेवावितारण (दाहिनी ओर बैठा हुआ), अपने भाई एडमंड हेवावितारण (बायीं ओर बैठा हुआ) और चार्ल्स अल्विस हेवावितारण (खड़ा हुआ) के साथ।
साइमन की अंत्येष्टि पर अनागारिक धर्मपाल ने एक भाषण दिया, जिसमें उन्होंने साइमन की वसीयत पढ़ी। साइमन ने अपनी सारी संपत्ति को बौद्ध विद्वता कार्यों के लिए उत्तरदान किया था, जिसमें त्रिपिटक (बौद्ध धर्म ग्रंथों की तीन पिटक) को जनता के लिए तथा बौद्ध मंदिरों में उपलब्ध कराना, आवासों (भिक्षुओं के लिए निवास गृह) का निर्माण करना तथा सराहनीय कार्यों और धर्म के उत्कृष्ट विद्वता के लिए अनुदान वितरित करना आदि अंतर्गत थे। आधुनिक विद्वान यह सकारते हैं कि पाली धर्म ग्रंथों के सिंहली में अनुवाद करने में उनकी वसीयत के द्वारा किया गया योगदान अपरिमेय है।
उसकी वसीयत को क्रियान्वित करते हुए उनके भाई चार्ल्स, जीजा जेकब मुणसिंह और भतीजा कुमारदास मुणसिंह पाली अट्ठकथाओं के सिंहली में अनुवाद कराके प्रकाशित करने में प्रमुख बने। वे विद्योदय परिवेण के न्यासी भी थे। श्रद्धेय नायक भिक्षु सिरि धम्माराम तिस्स तथा कोलंबो के विद्योदय परिवेण कालेज के प्राध्यापक के सहायक भिक्षु मापलगम चंदजोति द्वारा संपादित ‘परमत्थदीपनी’ अथवा ‘पेतवत्थु’ की टिप्पणी और पानदुर के सिरिसद्धमोदय परिवेण के उप प्राध्यापक भिक्षु पमुणुवे बुद्धदत्त के द्वारा संपादित ‘विसूद्धिमग’ उन अनूदित पाली ग्रंथों के अंतर्गत थे, जिन्हें पहली बार मुद्रण के लिए उपलब्ध किया गया था।
वसीयत के कार्यान्वयन को जारी रखने के लिए उसकी विधवा पत्नी, सोमावती हेवावितारण ने 1982 में अपनी मृत्यु से पहले सोमावती हेवावितारण संगठन की स्थापना की थी। साइमन और सोमावती की कल्पना को जीवित रखने के लिए साइमन हेवावितारण संगठन तथा सोमावती हेवावितारण संगठन आज तक कर्मठतापूर्वक काम कर रहे हैं।