अनागारिक धर्मपाल का जीवन

(17th of September 1864 – 29th of April 1933)

अनागारिक धर्मपाल

(1885 से 1931 तक)

21 वर्ष की उम्र से दॉन डेविड ने खुद को ‘अनागारिक’ (बेघरवाला) का नाम दिया और एक सन्यासी (अर्थात एक साधारण व्यक्ति और साधु के बीच का जीवन) के रूप में अपने नये जीवन की शुरुआत की। वे कॉलंबो में ब्रह्मविद्या संग में रहने लगे। उन्होंने समाज-सुधार और बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देने के लिए अथक प्रयास किया था। जैसे कि उनकी मृत्यु के बाद एक आलोचक ने लिखा है,

“उनके लिए कुछ भी बहुत छोटा या बहुत बड़ा नहीं था। वे अपना कमरा खुद साफ़ करते, अपना बिस्तर खुद बनाते, काम के लिए दफ़तर जाते, सभी खत लिखकर उन्हें पोस्ट करने के लिए खुद चले जाते। केवल पुण्य के लिए ही नहीं, बल्कि उनकी दिनचर्या के हिस्से के रूप में ही वे किसी के लिए व्याख्या करते, किसी और के लिए किसी कार्यक्रम का आयोजन कर देते, किसी और के लिए किसी भाषण का अनुवाद कर देते, अखबारों के लिए मौलिक लेख लिखते, वे सम्पादक के साथ अखबार की नीतियों के बारे में चर्चा करते और उसके लिए त्रुटियों को ठीक कर देते, और दफ्तर में आने वालों का साक्षात्कार लेते थे। उन्होंने सिलोन भर के लोगों को निमंत्रण देते हुए लिखा कि वे प्रधान कार्यालय आएँ और इस कार्यवाही की प्रगति के लिए अपनी सद्भावना का योगदान दें। उनके लिए सब एक सामान थे, चाहे कोई बूढ़ा हो, जवान हो या स्कूल का छात्र हो, पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़, उन्हें इसका फर्क नहीं पड़ता था कि कोई अमीर हो या गरीब। वे सहज रूप से जानते थे कि सार्वजनिक भलाई के प्रति प्रत्येक व्यक्ति किस प्रकार का योगदान दे सकता था। वे प्रतिदिन लगभग पंद्रह से सोलह घंटे गहन कार्यों में बिताते थे। (संघरक्षित, बी., 1952, अनागारिक धर्मपाल : एक जीवनी संक्षिप्त विवरण, बौद्ध प्रकाशन संग, कैंडी)

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1886 में जब अमेरिकी ब्रह्मविद्यावादी, हेनरी स्टील ओल्कॉट और अंग्रेज़ चार्ल्स वेबस्टर लिडबीटर (जो आगे जाकर आनंद विद्यालय के प्रधानाचार्य बने। आनंद विद्यालय बाद में श्री लंका का सबसे बड़ा बौद्ध द्वितीयक विद्यालय बन गया था) अपनी शैक्षिक परियोजनाओं के लिए धन जुटाने के लिए सीलोन के चारों ओर यात्रा करते थे, तब जो युवा उनके अनुवादक के रूप में उनके साथ जाता था, वह अनागारिक धर्मपाल था। इस लंबी यात्रा के दौरान उसने सिलोन के लोगों के जीवन की स्थिति के बारे में सीखा। अधिकतर सिंहली गाँववाले गरीब, ऋणी, अनपढ़ थे। उनमें आत्म-मूल्य की कमी थी और वे हमेशा अपने औपनिवेशिक शासक के डर में रहते थे।

1886 से 1890 तक संग के महाप्रबंधक तथा सहायक सचिव के रूप में काम करते हुए युवा अनागारिक ने ‘हेववितारण धर्मपाल’ का नाम अपनाया। यह नाम बाद में संक्षिप्त होकर, पहले ‘एच. धर्मपाल’ और बाद में ‘अनागारिक अधर्मपाल’ (सत्य के त्यागी रक्षक) हो गया। ओलकॉट और लिडबीटर के साथ काम करते हुए, युवा अनागारिक को पहली बार मुद्रण और प्रकाशन से परिचय प्राप्त हुआ, जब 1888 में उन्होंने 'सरसवि सँदरॅस' और 'द बुडिस्ट' (मुख्यतः उनके दादाजी और दोस्तों के द्वारा वित्त पोषित थे) पत्रिकाओं की शुरुआत की।

1889 में ओल्कॉट के साथ जापान की यात्रा के साथ, बौद्ध धर्म के प्रति धर्मपाल के जीवन-समर्पण का आरंभ हुआ। उन्होंने जापान के बौद्ध भक्तो को व्याख्यान देते हुए और उनके लिए भिक्षु हिक्कडुवे श्री सुमंगल जी के द्वारा संस्कृत में लिखित शुभकामनाओं का पत्र सुनाते हुए पूरे जापान में बड़े पैमाने पर यात्रा की। उस समय में वह एक दक्षिण बौद्ध परंपरा (थेरवाद) के भिक्षु के द्वारा उत्तरी बौद्ध परंपरा के (महायान) लोगों के लिए लिखित पहला पत्र था।

किसी तरह अंग्रेज़ कवि श्री. एडविन आर्नल्ड के द्वारा रचित 'लाइट ऑफ़ एशिया' नामक मशहूर कविता पढ़ने के बाद, छब्बीस साल के युवा धर्मपाल के जीवन में एक नया मोड़ आया। कविता के बाद अर्नोल्ड ने एक ब्रिटिश अखबार के लिए तत्काल में उपेक्षित बोध गया में अपनी यात्रा के बारे में भी एक लेख लिखा था, जहाँ पर शाख्य राजकुमार गौतम ने बुद्धत्व प्राप्त किया था। समाचार पत्रों में एक लेख यह भी था कि ब्रिटिश पुरातत्वविदों ने भारत में और भी अधिक ऐसे स्थलों की खोज की है, जो गौतम बुद्ध के चरणों के स्पर्श से पवित्र हो चुके थे। धर्मपाल ने 22 जनवरी 1891 को जापानी भिक्षु, कॉज़ेन गुनरत्न समेत साथियों के एक छोटे से समूह के साथ बो्ध गया की यात्रा की। अपनी प्रेरणा के क्षण के बारे में अनागारिक धर्मपाल यह कहते हैं कि

“नाश्ता करने के बाद हम दुर्गा बाबू और डॉ. चॅटर्जी के साथ बोध गया गये, जो बौद्ध भक्तों के लिए सबसे पवित्र स्थल है। 6 मीलों तक (गया से) चलने के बाद हम उस पवित्र जगह पर पहुँच गये। एक मील के आस पास हमारे धन्य प्रभु की टूटी हुई मूर्तियाँ आदि अवशेष इधर-उधर बिखरे हुए देखे जा सकते थे। महंत के मंदिर के प्रवेश द्वार पर पोर्टिको के दोनों ओर हमारे बुद्ध जी की मूर्तियाँ हैं, जो ध्यान मुद्रा और धर्मचक्र मुद्रा में हैं। कितनी पूजनीय है! पवित्र मंदिर - हमारे भगवान अपने सिंहासन पर बैठे हुए हैं और चारों ओर फैली हुई उनकी महान गंभीरता, एक पवित्र भक्त के हृदय को रुला देती है। कितना आनंदमय है! जैसे ही मैंने अपने माथे से वज्रासन को छुआ, मेरे मन में अचानक एक प्रेरणा आयी। उस अनुभव ने मुझे यहीं रुककर इस पवित्र स्थल की रक्षा करने के लिए प्रेरित किया। वह जगह इतनी पवित्र थी कि दुनिया में इसके सामान कोई भी चीज़ नहीं है, जहाँ राजकुमार शाक्य सिंह ने बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति की। जब अचानक यह प्रेरणा आयी, तो मैंने भिक्षु कॉज़ेन जी से पूछा कि क्या वे मेरा साथ देंगे? उन्होंने ख़ुशी से स्वीकार किया और उससे भी अधिक वे भी वही सोच रहे थे। हम दोनों ने गंभीरतापूर्वक यह वादा किया था की जब तक कोई बौद्ध भिक्षुगण इस जगह की ज़िम्मेदारी लेने के लिए नहीं आ जाते, हम वहीं रुकेंगे।” (संघरक्षित, बी.,1952, अनागारिक धर्मपाल : एक जीवनी संक्षिप्त विवरण, बौद्ध प्रकाशन संग)

प्रेरणा के उस क्षण के साथ बोध गया और सारानाथ (जहाँ पर बुद्ध जी ने 'मध्यम प्रतिपदा' के अपने सिद्धांत पर अपना सर्वप्रथम प्रवचन दिया था) को बौद्ध पूजा स्थलों के रूप में पुनः प्राप्त करने के लिए धर्मपाल का पवित्र अभियान आरंभ हुआ। इस कार्य के लिए धर्मपाल जी ने 1891 में भिक्षु हिक्कडुवे सुमंगल जी को संस्थापक अध्यक्ष के पद पर और खुद को सचिव के पद पर रखकर कॉलंबो में 'महाबोधि परिषद' की स्थापना की। बोध गया को पुनः प्राप्त करना उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य बन गया था।

किसी तरह उनकी विशिष्ट शक्ति के साथ उन्होंने कई अकल्पनीय क्षेत्रों की कार्यवाहों में काम किया। इनमें दुनिया में बुद्ध-वचन का प्रचार करना, बौद्ध परंपराओं के अलग-अलग संप्रदायों को एक वैश्विक समुदाय में एकत्रित करवाना, भारत और सिलोन के गरीबों को शिक्षित करना, सिलोन के गरीबों को आत्म-मूल्य की भावना को पुनः प्राप्त करने में मदद करने वाले एक सांस्कृतिक पुनरुत्थापन का निर्माण करना आदि अंतर्गत थे।

1893 में सर्वप्रथम विश्व धर्म संसद के लिए उस समिति के अध्यक्ष, डॉ. जे. आर. बरौस के द्वारा धर्मपाल को निमंत्रण मिला। धर्मपाल उस सभा के सबसे करिश्माई वक्ताओं में से एक थे। उनकी व्याख्या 'बौद्ध धर्म के प्रति दुनिया का ऋण' का श्रोताओं पर एक विशिष्ट प्रभाव पड़ा और मीडिया में भी उसका विवरण किया गया था। यह व्याख्या सुनकर महोदय सी. टी. स्ट्रौस नामक न्यूयॉर्क में रहने वाले, दर्शनशास्त्र के आजीवन विद्यार्थी, धर्मपाल से पंचशील प्राप्त करके बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया और अमेरिका में बौद्ध भक्त बनने वाले सर्वप्रथम व्यक्ति बना।

अपनी वापसी यात्रा पर हॉनॉलुलू के ब्रह्मविद्यावादियों के निमंत्रण पर वे हॉनॉलुलू में रुके, जहाँ पर महोदया मेरी रॉबिंसन फॉस्टर से उनकी मुलाकात हो गयी, जो उनके पिता की मृत्यु के बाद उनकी मुख्य दानकर्ता बन गयी।