अपने निजी जीवन तथा कार्यों के दैनिक अभिलेखन के अतिरिक्त, अनागारिक धर्मपाल ने कई मौलिक प्रकाशनों का प्रारंभ किया था, जो उनके समय के विशिष्ट विवारणों, तत्कालीन राजनीतिक-आर्थिक-धार्मिक समस्याओं तथा उनके उद्देश्य से संबंधित थे। उन्होंने 1893 में भारत के महाबोधि संग की मासिक पत्रिका के रूप में महाबोधि तथा संयुक्त विश्व पत्रिका का आरंभ किया था। उन्होंने संयुक्त राजधानी में 'ब्रिटिश बौद्ध' का प्रारंभ किया। वर्तमान में ये उनके और 19वीं सदी के अंत तथा 20वीं सदी के प्रारंभिक समय के विचारकों और कार्यकर्ताओं के निबंध तथा विवरणों का भंडार है।
1906 में अनागारिक धर्मपाल ने अपने लक्ष्य का प्रचार करने के लिए, विशेषतः ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के प्रतिरोध तथा भारत के बोध गया को दुनिया के बौद्ध-धर्मियों के लिए पुनःप्राप्त कराने के लक्ष्य का प्रचार करने के लिए, श्री लंका के महाबोधि संग के एक प्रकाशन के रूप में ‘सिंहल बौद्धया’ का प्रारंभ किया था। उनकी संरक्षक, मेरि फॉस्टर रॉबिन्सन ने पत्रिका के लिए प्रारंभिक रक़म प्रदान की थी, जब्कि सिंहली भाषा के जाने माने लेखकों ने लेखों का योगदान दिया था। पियदास सिरिसेन तथा वलिसिंह हरिश्चंद्र को संग के द्वारा संपादकों के रूप में नियुक्त किया गया था। 1915 में सैनिक कानून के अधिरोपण के बाद श्री लंका के औपनिवेशिक सरकार ने सिंहल बौद्धया को मुद्रांकित किया था। उसे 1922 में महाबोधि संग को वापस कर दिया गया।
इनके अतिरिक्त, अनागारिक धर्मपाल के लेखों में पुस्तिकाएँ, पत्रिकाओं तथा समाचार पत्रों में योगदान (तत्कालीन ब्रह्मविद्या पत्रिकाओं के लिए लिखित अनेक रचनाएँ), पत्र तथा भाषण भी अंतर्गत हैं। यद्यपि उनकी रचनाओं का कोई संपूर्ण संकलन एक प्रकाशन के रूप में उपलब्ध नहीं है, तथापि ऐसे कई संग्रह हैं, जिनमें उनकी रचनाओं की एक शृंखला के नमूनों को एक साथ रखने का प्रयास किया गया है। 1965 में विद्वान-राजनयिक डॉ. आनंद गुरुगे के द्वारा रचित वृहत ग्रंथ, जो 'सदाचारिता में लौटना' (रिटर्न टु राइटसनस) के नाम से प्रकाशित हुआ था, वह यकीनन धर्मपाल के अधिकांश कार्यों को एक ही खंड में सम्मिलित करने का सर्वोत्कृष्ट प्रयत्न है।