(1931 से 1933 तक)
1885 में जब से उन्होंने एक सन्यासी के रूप में अपना घर छोड़ा था, तब से बोध गया को पुनः प्राप्त करने के लिए, दुनिया भर में बुद्ध-वचन का प्रचार-प्रसार करने के लिए, बौद्ध दुनिया को एकजुट करने के लिए और गरीबों के जीवन में सुधार लाने के लिए अनागारिक धर्मपाल ने अपने जीवन को समर्पित किया था। फिर भी जिसके आधार पर वे अपने जीवन के कर्तव्यों पर खींचे जा रहे थे, वह उनका आध्यात्मिक अभ्यास था। उनकी व्यक्तिगत आकांक्षाएँ भी इसमें अंतर्गत थीं, जो उन्होंने धर्म के वृहत् महत्व को समझने वाले एक श्रद्धावान बौद्ध के रूप में बनायी थीं।
अधिकांश असहनीय शारीरिक पीड़ा से भरे उनकी कठिन जीवन शैली के बावजूद अनागारिक अपने आध्यात्मिक उद्देश्य से कभी विचलित नहीं हुए। वे सुबह 3 बजे ध्यानसाधना के लिए उठते थे। जैसे-जैसे साल बीतते गये, वे अपने अभ्यास में अत्यधिक गहरे स्तर पर गये और उन्होंने अपनी परम आकांक्षा को कभी नहीं खोया। जैसे-जैसे उनका स्वास्थ्य बिगड़ता गया और यद्यपि कभी-कभी मौत को छूकर वापस आ जाते थे, तथापि 1931 में वे भारत लौटे और सारनाथ में निम्नस्तरीय दीक्षा प्राप्त की। (श्रामणेर भिक्षु) उन्होंने 'श्री देवमित्त धम्मपाल' का नाम लिया।
भिक्षु संघरक्षित लिखते हैं : …साल के अंत में [11 नवंबर 1931] उन्हें मूलगंध कुटी विहार के उद्घाटन समारोह को देखने की संतुष्टि मिली, जो उनके परिश्रमों के एक मुकुट के समान था। समारोह तीन दिनों तक चले। उसके दौरान सारानाथ में लगभग एक हज़ार आगंतुकों को ठहराया गया, जिनमें से आधे से अधिक लोग विदेशों से आये हुए थे। 11 नवंबर के शाम को सर्दी के निर्मल आसमान में चमकते सूरज के किरण जब भिक्षुओं के पीले वस्त्रों पर और वहाँ पर एकत्रित भक्तों के शानदार रेशम पर पड़े, तब भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों से युक्त एक स्वर्ण मंजूषा को पुरातत्व के महानिदेशक के द्वारा महाबोधि परिषद को प्रदान किया गया, जिसे भारत सरकार की ओर से प्रस्तुत किया गया था। इस विचित्र आनंदोत्सव के बीच में पूजनीय अवशेषों को एक हाथी के पीठ पर रखकर एक रंगीन शोभायात्रा में तीन बार विहार की परिक्रमा करवायी गयी। उद्घाटन समारोह के अवसर पर भिक्षु धम्मपाल ने जब अपने भाषण में जनवरी 1891 में सारनाथ में अपनी पहली यात्रा का ज़िक्र किया, तब उन्होंने कहा, "यह जगह निम्न वर्ग के सूअर प्रजनकों के कब्ज़े में थी।” जब उन्होंने कुछ ऐसी मुश्किलों का ज़िक्र किया, जिनका सामना उन्हें करना पड़ा, तब श्रोतागण खामोश था। जिस वृद्ध योद्धा को एक पहियेदार कुर्सी में बिठाकर पंडाल तक ले आया गया था, उन्होंने अपनी आवाज़ में विजय के पुलक के साथ कहा, "आठ सौ वर्षों के निर्वासन के बाद, बौद्ध भक्त उनके अपने पावन इसिपतन पर लौट आये हैं। अंत में उन्होंने कहा, "महाबोधि परिषद की अभिलाषा, सम्मा संबुद्ध के करुणामय सिद्धांतों को किसी जाति और पंथ के भेद-भाव के बिना भारतवासियों तक पहुँचाने की है। मुझे विश्वास है कि पूरे भारत में तथागत के आर्य धर्म का प्रचार-प्रसार करने के लिए आप आगे बढ़ेंगे।" (संघरक्षित, बी (1952), अनागारिक धर्मपाल: एक जीवनी संक्षिप्त विवरण, बौद्ध प्रकाशन संग से)
यद्यपि नयी परियोजनाओं को पूरा करने के लिए हमेशा की तरह उनकी बहादुरी और दृढ़ भावना बढ़ती गयी, तथापि भारत में उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता गया। किसी तरह 1933 में सारनाथ में उन्होंने उच्च दीक्षा (उपसंपदा) प्राप्त की, क्योंकि वे कमज़ोर पड़ गये थे और वे जानते थे कि उनके दिन गिनती के रह गये थे। उच्च दीक्षा प्राप्ति के अवसर पर दस भिक्षु श्री लंका से भारत गये। बुद्ध जी की व्यवस्था के प्रति उनकी अथाह सेवा को ध्यान में रखते हुए, वरिष्ठ भिक्षुओं ने श्रामणेर भिक्षुत्व के लिए साधारणतया निर्धारित समय की परवाह किये बिना उनको उच्च दीक्षा में प्रवेश करवाया। 29 अप्रैल 1933 को बुद्ध जी के श्लोक जपते हुए भिक्षुओं के बीच में, उनके अनुयायी देवप्रिय वलिसिंह, उनके भतीजे, सिलोन से आये हुए राजा हेववितारण, उनके चिकित्सक, डॉ. नॉनडी और बोध गया भेजे गये श्रामणेर भिक्षुओं की उपस्थिति में भिक्षु देवमित्त धम्मपाल जी का निधन हो गया। उनका चेहरा मूलगंधकुटि की ओर मुड़ा हुआ था और उनके होंठो से निकला आखरी शब्द था, 'देवमित्त' (देवों के प्रिय मित्र)।
दो हफ्ते बाद देवप्रिय वलिसिंह के द्वारा उनकी अस्थियों को सारनाथ से कलकत्ता में स्थित महाबोधि परिषद के मुख्यालय तक ले जाया गया था। एक हिस्से को बाद में सारनाथ के मूलगंध कुटी विहार में स्थित एक छोटे से स्तूप में रखा गया और दूसरे हिस्से को वलिसिंह के द्वारा सिलोन लाया गया था। पहले रेलगाड़ी से भारत के दक्षिणी सिरे के रामेश्वरम तक, फिर नाव से सिलोन के तलयमनार तक, और फिर रेलगाड़ी से कॉलंबो तक।
कॉलंबो के रेलवे स्टेशन पर रेल पटरी के दोनों ओर "साधु, साधु, साधु," जपते हुए बेजोड़ भीड़ जमा हुई थी। अस्थियों के कलश को हेववितारण परिवार द्वारा स्थापित मठवासी कॉलेज, विद्योदय परिवेण तक शोभायात्रा से ले जाकर वहाँ के भिक्षुओं को सौंप दिया गया। भिक्षुओं ने उसे श्रीमत बारॉन जयतिलक (तत्कालीन गृहमंत्री) को सौंप दिया।
अस्थियों को श्रद्धांजलि देने के लिए उपस्थित भीड़ इतनी अधिक थी कि उनके लिए जगह बनाने के लिए परिवेण की चारदीवारी को गिराना पड़ा। आम तौर पर यह ग़लतफ़हमी फैली हुई है कि अनागारिक धर्मपाल के अस्थियों से श्री लंका में लाये गये हिस्से को कॉलंबो के सार्वजनिक कब्रिस्तान में स्थित हेववितरण परिवार के तहखाने में रखा गया है। किंतु यह गलत है। श्री लंका में लाये गये अस्थियों को अनागारिक धर्मपाल की एक मूर्ति के नीचे गाड़ दिया गया है, जो परिवेण के समक्ष स्थापित अनागारिक धर्मपाल संघ के मुख्यालय में स्थित है।