परिवार

Anagarika Dharmapala’s Father

मुदलियार एच. दॉन करोलिस

(1833 - 18 फ़रवरी 1906)

अनागारिक धर्मपाल के पिता, दॉन करोलिस हेवावितारण का जन्म सीलोन (वर्तमान श्री लंका) के दक्षिण के मातर, हित्तॅटिय, यटियान में हुआ था। वह हेवावितारण डिंगीरी अप्पुहामी नामक एक अमीर ज़मींदार के दोनों बेटों में से एक था। दॉन करोलिस को आधुनिक हेवावितारण परिवार का पितृ परिवार माना जा सकता है, जो देश के स्वतंत्रता-संग्राम में सबसे आगे था। दॉन करोलिस और उसका भाई हित्तॅटिय राज महा विहार के भिक्षु मिरिस्से रेवत जी के संरक्षण में शिक्षा प्राप्त करते थे, जिसके कारण उसके प्रारंभिक जीवन से ही गाँव के बौद्ध मंदिर के साथ एक घनिष्ठ संबंध बना रहा। उसके भाई ने दीक्षा नाम 'भिक्षु हित्तॅटिये अत्तदस्सी' का नाम अपनाकर एक भिक्षु के रूप में दीक्षा प्राप्त की और हित्तॅटिय राज महा विहार में एक पदधारी बने।

दॉन करोलिस ने कॉलंबो जाकर 'अन्दिरिस पेरेरा धर्मगुणवर्धन' नामक कॉलंबो के एक अमीर व्यवसायी की बेटी, मल्लिका से शादी की और पेटा में ‘एच. दॉन करोलिस और पुत्र’ के नाम से लकड़ी के सामान (फ़र्नीचर) की एक दुकान स्थापित किया। जिस छोटी-सी दुकान की स्थापना पेटा में की गयी, उन्नीसवीं तथा बीसवीं सदी में दॉन करोलिस की चतुर व्यावसायिक विदग्धता के तहत सिलोन और एशिया के सबसे बड़ी और सबसे प्रतिष्ठित औद्योगिक मंडलियों में से एक होने तक उसका विकास हुआ।

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1886 तक एच. दॉन करोलिस और पुत्र ऑस्ट्रेलिया को लकड़ी के सामान री निर्यात कर रहा था। 1895 में दक्षिण अफ्रीका के साथ वृहत लकड़ी के सामान के व्यवसाय चलाने के लिए लंदन में एक इंडो-अफ्रीका व्यवसाय संघ की स्थापना की गयी थी। दॉन करोलिस ने कॉलंबो के स्लेव आईलैंड इलाके में 'स्टीम फ़र्निचर वर्क्स' के नाम से व्यवसाय प्रतिष्ठान का पहला कारखाना स्थापित किया था। सदी के अंत तक 'एच. दॉन करोलिस और पुत्र' केवल ऑस्ट्रेलिया को ही नहीं, बल्कि दक्षिण अफ्रीका, भारत, बर्मा, इंग्लैंड, यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका को भी अपने उत्पादों को निर्यात कर रहा था। मंडली के द्वारा बनाये गये लकड़ी के सामान की सुंदरता और गुणवत्ता ने सिलोन कृषि प्रदर्शनियों, 1901 के भारतीय औद्योगिक प्रदर्शनी, 1900 के पेरिस प्रदर्शनी तथा 1904 के सेंट लुइस प्रदर्शनी में स्वर्ण तथा रजत पदक जिता दिये।

दॉन करोलिस के बड़े बेटे, डेविड पर उसका प्रभाव अथाह था। अनागारिक धर्मपाल अपनी दैनिकी में लिखते हैं कि, "मेरे हृदय में बोधि का बीजारोपण मेरे पिताजी के द्वारा किया गया था।" वह डॉन करोलिस ही था, जिसने अनागारिक धर्मपाल को ब्रह्मचर्य का व्रत लेने के लिए, सांसारिक धन-संपत्तियों पर निर्भर न रहने के लिए और और विनम्रता का व्यवहार रखने के लिए प्रोत्साहित किया। फिर उन्होंने बौद्ध धर्म के पुनःप्रवर्तन और देश के अल्पाधिकार प्राप्त लोगों के आर्थिक तथा सामाजिक पुनरुद्धार के प्रति अपने बेटे के कार्यों का पूरे दिल से समर्थन करते हुए उनके अनेक परियोजनाओं को वित्त पोषित किया। अनागारिक धर्मपाल के द्वारा सिलोन में स्थापित अनेक स्कूलों तथा तकनिकी कॉलेजों के लिए प्रारंभिक समर्थन और सारनाथ में खरीदे गये ज़मीन के हिस्से का संरक्षण दॉन करोलिस के द्वारा किया गया था।

जिन पुनःप्रवर्तन कार्यों में अनागारिक धर्मपाल हिस्सा थे, दॉन करोलिस भी व्यक्तिगत रूप से उनमें शामिल था। जनवरी 1884 में कर्नल ओल्कॉट के संरक्षण में 'बौद्ध धर्म सुरक्षा समिति' (जिसे कॉलंबो समिति के नाम से भी जाना जाता है) की स्थापना की गयी, जिसका उद्देश्य वैशाख पूर्णिमा की छुट्टी को पुनःस्थापित करना था। दॉन करोलिस को संचालन समिति के उपाध्यक्ष चुना गया और उसके ससुर को अध्यक्ष। मई 1885 में ब्रिटिश औपनिवेशिक कार्यालय के द्वारा वैशाख की छुट्टी को पुनःस्थापित किया गया था और समिति के भिक्षु मिगेट्टुवत्ते गुणानंद जी ने कॉटहेन दीपदुत्तराम में सार्वजनिक रूप से बौद्ध ध्वज फहराया था। 1906 में जब उनकी मृत्यु हुई, तब अनागारिक धर्मपाल को अपने बौद्ध धर्म के प्रचार संबंधी कार्यों में प्रयोग करने के लिए दॉन करोलिस ने एक वसीयत छोड़ दी।