(1846 - 27 जुलाई 1936)
मल्लिका, अनागारिक धर्मपाल की माँ, परिवार की कुलमाता थी। वह बौद्ध धर्म तथा उसके उद्देश्य के प्रति भक्तिपूण माहौल में पली-बढ़ी। उसके पिता जी, अन्दिरिस पेरेरा धर्मगुणवर्धन, जो कॉलंबो के सबसे अमीर बौद्धों में से एक थे, वे बौद्ध धर्म के पुनरुद्धार आंदोलन में पथप्रदर्शक थे। उन्होंने बौद्ध भिक्षुओं के लिए सर्वप्रथम मठवासी कॉलेज को स्थापित करने के लिए कॉलंबो के मरदान इलाके के मलिगाकंद में ज़मीन का एक बड़ा-सा हिस्सा और धन दान में दिया थाा, जो उस समय के पांडित्यपूर्ण विद्वान, भिक्षु हिक्कडुवे श्री सुमंगल जी के नेतृत्व में 'विद्योदय प्राच्य कॉलेज' के नाम से जाना जाने लगा।
काफी धन-संपत्तियों के बीच में जन्म लेने के बावजूद मल्लिका ने अपना जीवन वैराग्य तथा त्याग के स्वभाव के साथ बिताया। अनागारिक धर्मपाल अपनी दैनिकी में लिखते हैं कि यद्यपि बोधि का बीज उनके पिता के द्वारा स्थापित किया गया था, तथापि वह उनकी माँ थी, जो “उन्हें प्रतिसप्ताह अस्थायित्व के सिद्धांत के बारे में उपदेश देती थी।” अनागरिक धर्मपाल का मानना था कि उसका अलगाव उन प्रकाश के देवताओं का काम था, जो उन्हें परिवार से जुड़ने और बंधे रहने से रोकना चाहते थे।
उसकी परपोती, मानेल हेवावितारण रत्नतुंग ने 2012 में अपनी परदादी की याद में लिखा है :
“हम हर हफ्ते परदादी मल्लिका जी से मिलने जाते थे, जो एलो एवेन्यू के पास रहती थीं। एक बहुत ही वृद्ध मल्लिका एक सफ़ेद साड़ी और लम्बी बाजू वाली सफ़ेद जैकेट पहने हुए, एक शांत चेहरे के साथ एक सफ़ेद कुर्सी पर बैठी थी। उनके आस-पास बहुत सारे अनजान लोग थे। उनकी रसोई के अहाते में मैंने दो अली बाबा मर्तबानों को उबालते हुए देखा था, एक भिखारियों को नहलाने के लिए गरम पानी के साथ और दूसरा उन्हें भोजन देने के लिए चावल के साथ। मैंने सुना था कि उसने भिखारियों के जूओं से भरे हुए बाल काटे और स्नान करने के बाद पहनने के लिए अपने ही महँगे कपड़े दे दिये।”
कॉलंबो के बंबलपिटिय इलाके से ज़मीन और इमारतें खरीदने के लिए उसके सबसे छोटे बेटे, डॉ. चार्ल्स हेवावितारण ने उसे जो पैसे दिये, उन पैसों से मल्लिका ने 1920 में उस समय के उसी के समचित्त महिलाओं के समूह की सहायता के साथ 'मल्लिका अनाथ निवास समितिय' के नाम से वृद्ध तथा निराश्रय लोगों के लिए एक निवास स्थान की स्थापना की। इस परिषद को आज 'मल्लिका निवास समितिय' के नाम से जाना जाता है। वह परिषद मल्लिका निवास, स्नेह बाल विकास केंद्र और पराक्रम बाल विकास केंद्र का प्रबंधन करती है।
मल्लिका के जीवन में विपत्तियों की आभा थी। अपने जीवन काल में ब्रिटिश शासकों के हाथों से अपने बेटों का पीड़ित होना, निर्वासन और कारावास के साथ-साथ अपने सभी बच्चों की मृत्यु देखने के लिए भी वह जीवित रही।