(1827 से 1911 तक)
हमारे पूज्यतम भिक्षु हिक्कडुवे श्री सुमंगल जी का जन्म 20 जनवरी 1827 को हुआ था। वह श्री लंका के इतिहास के एक अंधकार का युग था।। उस समय पुर्तगाली तथा डच उपनिवेशवादियों के दमघोटू शासन के कारण जिस देश को भयंकर कष्ट सहना पड़ा, उसे ब्रिटिश साम्राज्य के सामने आधिकारिक तौर पर आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर किया गया। अतः 2 मार्च 1815 को श्री लंका ने ब्रिटिश साम्राज्य का उपनिवेश बनकर 2538 वर्षों की अपनी स्वतंत्रता खो दी।राज्यपाल रॉबर्ट ब्राउनरिग ने बौद्ध धर्म को देश के मुख्य धर्म की स्थिति में सुरक्षित रखने का वचन देते हुए कॅन्डियन अभिसमय पर दस्तख़त लगाया, लेकिन सत्ता में आते ही पूरे देश में ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार को अग्रता देते हुए वह अपने वचन से मुक़र गया।
इसके कई दशकों बाद लोगों के बीच में बौद्ध धर्म के प्रति जो आस्था थी, उसका अपकर्ष होने लगा। स्थिति को सँभालने के लिए भिक्षु वॅलिविट श्री सरणंकर संघराज जी ने एक धार्मिक पुनरुत्थान का आरंभ किया, जो देश के सभी भिक्षुओं को एक साथ लाया। किंतु विभिन्न संप्रदायों के बौद्ध भिक्षुओं के बीच मतभेद होने के कारण वह प्रयत्न असफ़ल रहा। हालात इतनी बिगड़ गयी थी कि 1852 में जेम्स दि अल्विस, जिसने सिदत सँगराव का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया था, उसने भविष्यवाणी की थी, कि 19वीं सदी के अंत तक सभी सिंहली कवी त्रिरत्नों के आशीर्वाद की जगह ईसाई भगवान (ईसा मसीह) के त्रिगुण आशीर्वाद माँगकर अपना काम शुरू करेंगे। जैसा कि 25 अक्तूबर 1861 के पाली ग्रंथ समिति की पत्रिका में प्रकाशित हुआ था, उसने यह कहा है कि,
“वास्तव में यह मानने के लिए प्रचुर आधार हैं कि निकट भविष्य में बौद्ध धर्म इस द्वीप से लुप्त हो जाएगा। मेरा यह मानना है कि साधारण जनता को सचेत किये बिना, धीरे-धीरे पूरे देश में ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार किया जाए, तो देश में प्रचलित गलत धारणाएँ तथा मूर्खताएँ बहुत जल्द ही कम हो जाएँगी।”
यह कथन बार्थोलोम्यूज़ नामक एक फ़्रांसिसी पत्रकार के कथन से मेल खाता था, जिसने कहा था कि श्री लंका में जो बौद्ध भिक्षु गण हैं, वे इस बौद्ध युग को लुप्त होने से रोकने के लिए बहुत कमज़ोर हैं और निकट भविष्य में इस दशा में बदलाव का कोई संकेत नहीं है।
यह सुस्पष्ट है कि ब्रिटिश साम्राज्य, जिसे उस समय पूरे देश पर शासन अधिकार प्राप्त था, वह श्री लंका से बौद्ध धर्म को पूरी तरह निकालकर उसकी जगह ईसाई धर्म का प्रभुत्व स्थापित करना चाहता था। देश में अपनी सत्ता को मज़बूती से स्थापित करने के लिए यह आवश्यक था। इसलिए स्कूल स्थापित करके पाश्चात्य संस्कृति के प्रचार-प्रसार करने के लिए यूरोप से ईसाई प्रचारकों को श्री लंका भेजा गया। 13 जून 1816 को इंग्लैंड के ब्रिटिश नेता, विलियम विल्बर्फोर्स को भेजे गये एक खत में राज्यपाल ब्राउनरिग ने यह लिखा था कि यह मानने के लिए पर्याप्त कारण हैं कि एक धर्म के रूप में बौद्ध धर्म बहुत जल्द ही श्री लंका से लुप्त हो जाएगा।
श्री लंका में एक बहुत ही अंधकारमय अवधि में दन्देगॉड गमगे क्रिस्टीना और उसके पति, दॉन जोहानस अबेवीर गुणवर्धन लियनारच्चि के घर एक प्यारे-से बेटे का जन्म हुआ था। चार साल की उम्र में बच्चे को बपतिस्मा दिया गया और उसका नाम निकोलस रखा गया। यदि उसे ऐसा ईसाई नाम न दिया जाता, तो उसे उस समय में प्रतिष्ठित किसी भी स्कूल में प्रवेश करने की अनुमति न मिल गयी होती। ईसाई गिरजाघर के फ़ादरी लोगों के साथ घनिष्ट संबंध रखने के फलस्वरूप गुणवर्धन का पहलौठा बेटा, लुइस, ईसाई धर्म का अनुयायी बन गया। इसके कारण पाँच साल के निकोलस को गाँव के बौद्ध मंदिर के भिक्षु सोभित जी को सौंप दिया गया। बौद्ध भिक्षुओं के मार्गदर्शन में पले-बढ़े इस छोटे बालक को गोल फोर्ट में स्थित केंद्रीय विद्यालय में प्रवेश करने की अनुमति दी गयी, क्योंकि वह ईसाई गिरजाघर के द्वारा बपतिस्मा प्राप्त लोगों में से एक था।
जिस ग्रामीण ज्योतिषी ने निकोलस की कुंडली पढ़ी, वह उसके पिता को यह विश्वास दिलाने में समर्थ था कि लड़का बहुत बदकिस्मत है और इस बदकिस्मती के कारण बहुत कम उम्र में ही उसकी मृत्यु हो जाएगी। इस भविष्यवाणी ने इस युवक के जीवन की दिशा बदल दी। 1840 में भिक्षु माबॉटुवान रेवत जी और भिक्षु मलगॉड सिरिनिवास जी के पर्यवेक्षण में, गाल्ल, तेलवत्त, तॉटगमुव के बौद्ध मंदिर में उसने एक बौद्ध भिक्षु के रूप में दीक्षा प्राप्त की।
भिक्षु बनने के बाद उन्हें 'हिक्कडुवे सुमंगल' नाम दिया गया। वे बहुत भाग्यशाली थे कि उन्हें भिक्षु वलाने श्री सिद्धार्थ जी जैसे अनेक विद्वान् भिक्षुओं के मार्गदर्शन में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हुआ और उन्होंने तब तक कड़ी मेहनत से पढ़ाई की, जब तक कि वे पाली, सिंहली, संस्कृत तथा अंग्रेज़ी आदि कई भाषाओँ में महारत हासिल न कर लेते।
1848 में कैंडी के मलवतु बौद्ध सभागृह में एक बौद्ध भिक्षु के रूप में उनकी उच्च दीक्षा प्राप्ति हुई। एक युवा श्रामणेर भिक्षु के रूप में भिक्षु हिक्कडुवे सुमंगल जी मुद्रित माध्यों में अपने विचारों को प्रकाशित करते हुए ईसाई प्रचारकों के द्वारा बौद्ध धर्म के विरुद्ध की गयी आलोचनाओं से मुकाबला करने लगे। 1858 में देश के दक्षिण प्रदेश को अन्य धर्मों के नियंत्रण से मुक्त कराने के लिए भिक्षु हिक्कडुवे सुमंगल जी ने 'लंकोपकार' नाम से एक मुद्रणालय की स्थापना की और किताबें छापना शुरू किया - 'लंकालोक' अखबार इनमें से सबसे महत्वपूर्ण है। तत्पश्चात उनके संरक्षण में कई सिंहली बौद्ध स्कूलों की स्थापना की गयी और उनमें सभी आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध थीं। 1871 में वे मालिगाकन्द प्रदेश में चले गये और 1873 में उन्होंने 'विद्योदय' नाम से एक ज्ञान भण्डार की स्थापना का आरंभ किया। [अनागारिक धर्मपाल के नाना के निमंत्रण पर, जो इस संस्था की स्थापना में सहायक था]
थाईलैंड, बर्मा, बांग्लादेश तथा जापान आदि देशों से भिक्षु कॉज़ेन गुणरत्न, भिक्षु कॉजीना कॉणडंञ, सॅटो और टॉशिबाना आदि महायान बौद्ध धर्म के अनुयायी भी पूज्य भिक्षु के संरक्षण में थेरवाद बौद्ध धर्म की शिक्षा प्राप्त करने के लिए विद्योदय मठवासी कॉलेज आये थे।
भिक्षु मॉहॉट्टिवत्ते गुणानंद जी, जिन्होंने 1873 में प्रसिद्द पाणदुर विवाद में भाग लिया था, उन्होंने यह निश्चय किया कि भिक्षु हिक्कडुवे सुमंगल जी भी विवाद में समर्थन देने के लिए उनके साथ आएँ। वह विवाद इतना प्रसिद्ध हो गया था कि 'सत्य के अन्वेषक' नामक एक अमेरिकी पत्रिका में इसके बारे में जानकारी छाप दी गयी। (थोमस पेन भी इस पत्रिका के संरक्षकों में से एक था, जिसने संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान के निर्माण में एक मुख्य भूमिका निभायी) विवाद के बारे में प्रकाशित लेख के परिणामस्वरूप, कर्नल हेनरी स्टील ओल्कॉट और रूसी दार्शनिक तथा लेखिका-हेलेना ब्लावाट्स्की आदि कई प्रभावशाली व्यक्ति श्री लंका आने के लिए प्रोत्साहित हुए। 17 मई 1880 को उन दोनों ने गोल के विद्यानंद मठवासी कॉलेज में बौद्ध धर्म को अपना धर्म स्वीकार किया और पूज्य भिक्षु के संरक्षण में पाली भाषा तथा बौद्ध दर्शन का अध्ययन करना आरंभ किया।
वे शिक्षा का महत्व समझते थे और यह समझते थे कि श्री लंका में बौद्ध धर्म जिस दयनीय स्थिति पर है, उससे बचाने के लिए शिक्षा का प्रयोग किस प्रकार किया जा सकता है। उसके फलस्वरूप कॉलंबो में परम विंञानार्थ निगम को स्थापित किया गया। 1895 में इस निगम ने कॉलंबो में आनंद विद्यालय की स्थापना की और कैंब्रिज के स्नातक, अमेरिकी मूल के ए. ई. बुलटजेन्स को उसके प्रधानाचार्य के पद पर नियुक्त किया। इसके बाद देश में और भी कई स्कूलों की स्थापना की गयी, जैसे- कॉलंबो में नालंद विद्यालय, कैंडी में धर्मराज विद्यालय और गोल में महिंद विद्यालय अदि।
1885 में भिक्षु हिक्कडुवे सुमंगल जी ने उस समिति की अध्यक्षता की, जिसने बौद्ध ध्वज का निर्माण किया था। बौद्ध दर्शन में रूचि रखने वाले अनेक विदेशी लोग केवल इसलिए श्री लंका आते थे, ताकि वे हमारे पूज्य भिक्षु से मिल सकें और उनके मार्गदर्शन में बौद्ध धर्म का अध्ययन कर सकें। थोमस विलियम रिस डेविड्स, (1867) जो गोल के तत्कालीन दंडाधिकारी थे, वे कई बौद्ध भिक्षुओं से पाली भाषा सीखते थे, जैसे- भिक्षु यात्रामुल्ले धम्माराम जी, भिक्षु दॉडन्दूवे पियरतनतिस्स जी, भिक्षु वॅलिगम श्री सुमंगल जी और वस्कडुवे सुभूति जी आदि। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि गहनता से बौद्ध धर्म पर परिचर्चा करने के लिए वे हमारे भिक्षु हिक्कडुवे सुमंगल जी से अक्सर मिलते रहें और इस प्रकार उन्होंने बौद्ध धर्म के बारे में ज्ञान की व्यापक संपत्ति को इकट्ठा किया। इससे हमारे पूज्य भिक्षु को श्री लंका में ब्रिटिश शासन के अनेक प्रभावशाली हस्तियों के साथ सम्मिलित होने का और उनके साथ मित्रता बनाकर उनका सम्मान अर्जित करने का अवसर प्राप्त हुआ था। इन संबंधों के द्वारा भिक्षु हिक्कडुवे सुमंगल जी को स्पष्टतः यह समझने का अवसर प्राप्त हुआ कि उन्हें किस प्रकार विदेशियों को बौद्ध दर्शन समझाना चाहिए, ताकि वे स्पष्टतः यह समझ पाएँ कि वास्तव में बौद्ध दर्शन क्या है।
जर्मन मूल के पौल डाल्के, एक प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक था, जो विशेष रूप से भिक्षु हिक्कडुवे सुमंगल जी से मिलने के लिए ही श्री लंका आया था, ताकि वह बौध धर्म की शिक्षाओं के अनुसार अनात्मवाद का अध्ययन कर सके।
युवक अनागारिक धर्मपाल ने श्री लंका के ब्रिटिश राज्यपाल के बारे में शिकायत करते हुए हमारे पूज्य भिक्षु के नाम से ग्रेट ब्रिटेन के विदेश सचिव को एक खत लिखा था। यद्यपि उस समय हमारे पूज्य भिक्षु को इस बात की जानकारी नहीं थी कि उनके नाम से ऐसा खत भेजा गया है, तथापि इसकी जानकारी मिलने के बाद भी वे परेशान नहीं हुए। 1893 में भिक्षु हिक्कडुवे सुमंगल जी को बौद्ध धर्म की थेरवाद शिक्षाओं के प्रतिनिधि के रूप में, शिकागो में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक सम्मलेन के लिए आमंत्रित किया गया था। किसी तरह हमारे पूज्य भिक्षु के अनुरोध पर, उनके आशीर्वाद के साथ अनागारिक धर्मपाल ने उनकी जगह इस सम्मलेन में भाग लिया और अमेरिका में बौद्ध धर्म के बारे में अभिरुचि की लहर उत्पन्न की। इससे पूज्य भिक्षु तथा अनागारिक धर्मपाल के बीच में एक गहरा संबंध ब। भिक्षु हिक्क्डुवे सुमंगल जी ही महाबोधि परिषद् के सर्वप्रथम अध्यक्ष भी बन गये। भारतीय उपमहाद्वीप में बौद्ध धर्म को पुनःस्थापित करने के लिए अनागारिक धर्मपाल के द्वारा किये गये सभी प्रयत्नों के दौरान पूज्य भिक्षु ने उनका समर्थन तथा मार्गदर्शन किया था।
जनवरी 1891 में जब अनागारिक धर्मपाल भारत के बोध गया जाने के लिए रवाना हुए, तब पूज्य भिक्षु ने जापानी मूल के भिक्षु कॉज़ेन जी को उनके साथ भेजने का सुनिश्चय किया था। हालाँकि इस पवित्र स्थान को नष्ट करने की कोशिश करने वाले अन्य धर्मों के नियंत्रण से बोध गया को बचाने के लिए जापानी सरकार से सहायता माँगने के लिए अनागारिक धर्मपाल को उसी वर्ष में भारत से जाना पड़ा। भारत लौटने पर वे यह जानकार अधिक निराश हो गये कि भिक्षु कॉज़ेन जी का निधन हो गया था।
भिक्षु हिक्कडुवे सुमंगल जी ने दृढ़तापूर्वक यह कहा कि भारत में बौद्ध धर्म को पुनःस्थापित करने का अत्यधिक प्रभावशाली साधन, भारतीय विद्वानों को पाली भाषा सिखाना है। 1907 में पूज्य भिक्षु के अनुरोध से कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलाधिपति, आशुतोष मुख़र्जी की सहायता के साथ अनागारिक धर्मपाल ने उस विश्वविद्यालय में पाली भाषा अध्ययन विभाग को स्थापित किया था। हमारे पूज्य भिक्षु की अनुमति के साथ नव-स्थापित विभाग के सर्वप्रथम विभाग अध्यक्ष बनने के लिए भिक्षु सूरियगॉड सुमंगल जी को कलकत्ता बुलाया गया था।
डॉ. नालीनाक्षा दत्ता, सुकुमार दत्ता, डॉ. बी. सी. लौ, डॉ. बी. एम. बरुआ, अनुकुल चंद्र बरुआ और दीपक कुमार बरुआ आदि महान बुद्धि जीवियों ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के पाली भाषा विभाग से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और समस्त भारत तथा यूरोप के विश्वविद्यालयों में अपनी बहुमूल्य सेवा का योगदान दिया। यहाँ तक कि श्री लंका के कुछ सुप्रसिद्ध विद्वानों ने भी भारत के कलकत्ता विश्वविद्यालय के उसी विभाग से स्नातक उपाधि प्राप्त की थी, जैसे- भिक्षु वलपॉल राहुल जी, भिक्षु उरुवेल धम्मरतन जी, सागर पलन्सूरीय, सिरिपाल लीलरत्न, विमलानंद तेन्नाकोन, डी. ई. हेट्टिआरच्ची और जिनदास पेरेरा आदि। इस प्रकार स्नातक उपाधि प्राप्त भिक्षु जगदीश कश्यप तथा भिक्षु उरुवेल धम्मरतन जी ने साथ मिलकर नालंद विश्वविद्यालय की स्थापना की, जिसने दुनिया को कई महान वियतनामी, जापानी, थाई, कम्बोडियाई तथा श्री लंकाई विद्वान प्रदान किये। परम पूज्य भिक्षु अकुरॅटिये अमरवंश जी, भिक्षु रद्दॅल्ले पंञालोक जी, भिक्षु गनेगम सरणंकर जी, भिक्षु कनन्के वजिरञाण जी और भिक्षु हैगॉड केमानंद जी आदि उनमें से कुछ थे। उनमें से अधिक भिक्षुओं ने श्री लंका के विद्योदय परिवेण कॉलेज में अपनी बहुमूल्य सेवाएँ प्रदान की। जिस पाली भाषा विभाग की स्थापना पहले केवल कलकत्ता विश्वविद्यालय में की गयी थी, बाद में कई अन्य विश्वविद्यालयों में भी उसकी स्थापना की गयी थी, जैसे- वाराणसी, दिल्ली, पूणे तथा मगध विश्वविद्यालय में भी।
(लेख का श्रेय : डेली न्यूज़, 21 अप्रैल 2021 : लेखक - अमेरिका के मुख्य संघ नायक, पामंकड श्री महा विहार, लॉस एंजेलीस का धर्म विजय बौद्ध मंदिर, संयुक्त राज्य अमेरिका)
For more details see:
Blackburn, Anne M (2010). Locations of Buddhism: Colonialism and Modernity in Sri Lanka, Chicago University Press, Chicago.