संरक्षक

कर्नल हेनरी स्टील ओलकॉट

कर्नल हेनरी स्टील ओलकॉट

(1832-1907)

कर्नल एच. एस. ओलकॉट, एक किसान का बेटा था, जिसने एक पत्रकार के रूप में अपने कार्य-जीवन का आरंभ किया था। तत्पश्चात अमेरिकी असैनिक युद्ध के दौरान वे सेना में भर्ती हो गये और उसमें वे एक अधिकारी थे। तत्पश्चात वे एक वकील बन गये, जो प्रसिद्ध अमेरिकी राष्ट्रपति, अब्राहाम लिंकॉन की हत्या के मुक़दमे पर बैठे।

1874 में घटित 'महा पानदुर विवाद', एक ऐसा विवाद था, जो श्री लंका की राजधानी, कॉलंबो के दक्षिण के एक शहर में ईसाई धर्म तथा बौद्ध धर्म के बीच में हुआ था। एक वकील के द्वारा की गयी सूचना से यूरोप के एक स्थानीय समाचार पत्र, 'टाइम्स ऑफ़ सिलोन' में इस विवाद के बारे में प्रकाशित हुआ था। द्वीप में आये हुए एक पूर्व प्रचारक, डॉ. जे.एम. पीबल्स ने प्रतिवेदनों को 'ईसाई धर्म तथा बौद्ध धर्म के बीच रू-बरू परिचर्चा' नामक प्रकाशन में संकलित किया और उसे अमेरिका में ओलकॉट को दे दिया। आध्यात्मवाद तथा गृह्यंतर, तत्कालीन पश्चिम में रोचक विषय बन गये थे। उदाहरणार्थ, आर्थर कॉनन डॉयल, जो रोमांचक शर्लाक होम्स किताबों का लेखक था, वह विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान स्कूल के सह-संस्थापकों में से एक था।

जब ओलकॉट न्यूयॉर्क में थे, तब संयोग से उनकी मुलाकात 'हेलेना ब्लावाट्स्की' नामक एक महिला से हुई, जो एक संभ्रांत रूसी परिवार से थी, किंतु अपना देश छोड़कर अमेरिका आ गयी थी। वह भी आध्यात्मवाद में रूचि रखती थी और उसने 1875 में ओलकॉट के साथ मिलकर ब्रह्मविद्या संग की स्थापना की थी। उनके उद्देश्य थे;

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* जाति, मत, वर्ण या रंग के भेदभाव के बिना मानवता के विश्वव्यापी केंद्र का निर्माण करना
* धर्म, दर्शन तथा विज्ञान के तुलनात्मक अध्ययन को प्रोत्साहन देना
* प्रकृति के अस्पष्ट नियमों तथा मानवता में छिपी शक्तियों का अन्वेषण करना

बौद्ध धर्म की ओर से विवाद में मुख्य वक्ता, भिक्षु मिगेट्टुवत्ते गुणानंद जी तथा उस समय के एक सुशिक्षित विद्वान, विद्योदय परिवेण के भिक्षु हिक्कडुवे श्री सुमंगल जी के साथ ओलकॉट पत्राचार कर रहे थे। ओलकॉट तथा ब्लावाट्स्की दोनों ने भारत के रास्ते से श्री लंका तक जलयात्रा करने के लिए जहाज़ पर चढ़ने का निर्णय लिया था और वे गोल के दक्षिणी बंदरगाह पर पहुँच गये, जहाँ पर श्री लंकाई लोगों के एक विपुल जनसमूह के द्वारा उनका स्वागत किया गया था। 16 मई 1880 को गोल के एक बौद्ध मंदिर में ओलकॉट तथा ब्लावाट्स्की दोनों, बौद्ध भक्तों के द्वारा अनुपालन किये जाने वाले पंचशील का आश्रय लेकर बौद्ध भक्त बन गये। उन दोनों को बौद्ध धर्म में परिवर्तित होने वाले सर्वप्रथम पश्चिमी व्यक्ति माना जा सकता है।

उस समय 16 साल के नव युवक अनागारिक धर्मपाल, उस दिन उस कार्यक्रम के अवसर पर बौद्ध मंदिर में मौजूद थे और उन्होंने जो देखा, उससे वे अन्तःप्रेरित हो गये थे। उन्होंने यह बयान किया है कि वे अपने पिता जी और एक मामा के साथ ओलकॉट के सर्वप्रथम सार्वजनिक भाषण सुनने के लिए स्कूल से पैदल चले गये और जब ओलकॉट तथा ब्लावाट्स्की ने युवक से हाथ मिलाये, तो वे कितने प्रसन्न हुए थे। ओलकॉट के आगमन से और तत्पश्चात वाक्पटु (चाँदी जैसी ज़ुबान वाले) भिक्षु मिगेट्टुवत्ते जी के साथ दो मंज़िली टाँगे पर बैठकर, पूरे द्वीप में सफ़र करते हुए बैठकों का आयोजन करने से बौद्ध भक्त, विशेषतः श्री लंका के ग्रामीण बौद्ध भक्त प्रोत्साहित हुए। बाद में अपने अंग्रेजी के ज्ञान के साथ अनागारिक धर्मपाल इन बैठकों में ओलकॉट के अनुवादक तथा ब्रह्मविद्या संग के पूर्णकालिक सक्रिय प्रतिभागी कार्यकर्ता बन गये।

ओलकॉट ने अपना अधिकांश समय सी. डबलिव. लीडबीटर के साथ श्री लंका के बौद्ध शैक्षिक कार्यों में बिताया। उन्होंने बौद्ध बच्चों के लिए लगभग 300 स्कूलों की स्थापना की। तब तक धर्मपाल भी ब्रह्मविद्या संग के सदस्य बन चुके थे, क्योंकि ब्रह्मविद्यावाद, बौद्ध धर्म के पुनर्जन्म की अवधारणा से जुड़ा हुआ था। हालाँकि इनमें विरोधाभास भी था क्योंकि ब्रह्मविद्यावादी एक गैर-सांप्रदायिक धर्म का प्रचार करते हैं। ओलकॉट और ब्लॉवात्स्की तुरंत इस अंतर को समझ गये और उन्होंने सिलोन ब्रह्मविद्या संग में एक बौद्ध अनुभाग का निर्माण किया। युवा धर्मपाल ने ओलकॉट के साथ जापान की यात्रा की, जहाँ पर जापान के बौद्ध भक्तों के द्वारा उनका शानदार स्वागत किया गया था। हज़ार वर्षों में यह पहली बार थी, जब श्री लंका जैसे देशों में प्रचलित थेरवाद बौद्ध संप्रदाय तथा जापान में प्रचलित महायान बौद्ध संप्रदाय एकत्रित हुए।

प्रारंभिक समय में जब धर्मपाल ने बोध गया को बौद्ध भक्तों को लौटाने के लिए अपना अभियान का आरंभ किया था, तब ओलकॉट ने ही कानूनी सलाह लेने के लिए अपने खुद के पैसे खर्च किये थे और मुक़द्दमे के दौरान, बोध गया में निवास करते समय आवासीय बौद्ध भिक्षुओं का किराया भी चुका दिया था। हालाँकि कुछ सालों बाद ओलकॉट, ब्रह्मविद्यावादी तथा सामाजिक कार्यकर्ता, श्रीमती एनी बेसेंट के साथ जुड़ गये, जो तब तक भारत के मद्रास, अड्यार में रहती थीं और हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ, ‘भगवद गीता’ में अपनी अभिलाषाओं के लक्ष्य को खोज रही थीं। धीरे-धीरे ओलकॉट बौद्ध धर्म से विरक्त होकर ब्रह्मविद्या पर ध्यान देने लगे और एक तरह से उन्होंने अपनी ऊर्जा को भारत में हिंदू धर्म को पुनर्जीवित करने में लगा दी।

एक समय में ओलकॉट के साथ अनागारिक धर्मपाल के गंभीर मतभेद थे। विषेशतः ये मतभेद तब गंभीर हुए, जब एक वृद्ध सिपाही ने श्री लंका की पहाड़ी राजधानी, कैंडी में स्थापित महात्मा बुद्ध के पवित्र दाँत अवशेषों की प्रामाणिकता की पर और बौद्ध धर्म के अनुसार एक सृष्टिकर्ता के मुद्दे पर सवाल उठाये थे। ओलकॉट ने अपने संस्मरणों में कहा है कि बोध गया में कानूनी सलाह के लिए तथा बोध गया में संपत्ति की प्राप्ति के लिए धर्मपाल के द्वारा जो भारी खर्च की गयी, वे उसके विरुद्ध थे। ब्रह्मविद्या संग की बंगाली शाखा ने पूरी तरह धर्मपाल का समर्थन किया। ऐसे समय में भी बंगाली ब्रह्मविद्या संग ने अनागारिक धर्मपाल के बोध गया उद्धार के अभियान का समर्थन किया था, जब हिंदू लोग महा बोधि परिषद् पर यह आरोप लगते हुए उनके दोष निकाल रहे थे कि वे हिंदू लोगों को बौद्ध धर्म में परिवर्तित करने का प्रयत्न कर रहे हैं। ओलकॉट ने महाबोधि परिषद् को इस्तीफा दे दिया और धर्मपाल ने अभिज्ञता से यह सुनिश्चित करने के लिए ब्रह्मविद्या संग से संबंध तोड़ दिया कि महाबोधि परिषद् केवल (सिर्फ और सिर्फ) बौद्ध भक्तों का ही प्रतिनिधि बने, न कि ब्रह्मविद्या संग की। इससे मतभेद और भी तीव्र हो गये।

श्री लंका के नागरिक, जो तब तीन सदियों से भी अधिक समय तक यूरोपीय शासन की दासता में रहते आये थे, और जिनके धर्म को केवल गाँवों के भिक्षुओं के द्वारा ही जीवित रखा गया था, उनके बीच बौद्ध धर्म को पुनर्जीवित करने वाले व्यक्ति के रूप में श्री लंका में आज तक ओलकॉट का अत्यधिक सम्मान किया जाता है। उनके द्वारा स्थापित किये गये स्कूलों के लिए उनका स्मरण किया जाता है, जिनमें से कुछ आज भी कार्यरत हैं। राजधानी कॉलंबो के मुख्य रेलवे स्टेशन के सामने और कुछ अन्य शहरों में उनकी प्रतिमाएँ लगायी गयी हैं। जैसे गोल अदि, जहाँ पर वे पहली बार आये थे। अन्यत्र शाखाओं के साथ गोल में प्रारंभित सिलोन ब्रह्मविद्या संग की बौद्ध शाखा को बाद में कॉलंबो में स्थानांतरित किया गया था। क्योंकि स्टीमर/ भाप जहाज़ों ने गोल को नहीं, बल्कि कॉलंबो को द्वीप के प्रमुख बंदरगाह बनाया था। वर्तमान में उसको 'बौद्ध ब्रह्मविद्या संग’ के नाम से जाना जाता है।

For more details see:
https://www.gutenberg.org/ebooks/authors/search/?query=Olcott,+Henry+Steel
· Guruge, Ananda W. P. Free at Last in Paradise, Authuhouse, Bloomington, Ind, 1998
· Murphet, Howard: Hammer on the mountain, life of Henry Steel Olcott (1832–1907); Theosophical Publishing House, Wheaton 1972; ISBN 0-8356-0210-9
· Prothero, Stephen R.: The White Buddhist: The Asian Odyssey of Henry Steel Olcott; Indiana University Press, Bloomington 1996; ISBN 0-253-33014-9