अनागरिक धर्मपाल के मुख्य अनुयायी, वलिसिंह ने श्री लंका तथा भारत दोनों देशों के महाबोधि परिषदों के महासचिव के रूप में परिषद् के कार्यों में उल्लेखनीय योगदान दिया था। 10 फ़रवरी 1904 को जन्मे वलिसिंह, सात सदस्यों के परिवार में छठा बच्चा था। वह कैंडी के अभिजात वर्ग का वंशज था, और उत्तर काल में उनमें से अधिकांश लोगों की तरह धनवान न होने पर भी उसका सम्मान किया जाता था।
यह 1912 की बात है, जब अनागारिक धर्मपाल राष्ट्रीय पुनर्जीवन तथा बौद्ध धर्म के बारे में व्याख्यान देते हुए सबरगमुव प्रदेश में यात्रा कर रहे थे, तब वलिसिंह ने उन्हें देखा और सुना, जो उस समय केवल आठ साल का था। वह उस भाषण से अधिक कुछ याद नहीं कर पाया, जो उसने उतनी छोटी उम्र में सुना था। किंतु बैठक के बाद अनागारिक ने वलिसिंह के पोष्य माता-पिता से बात की थी, जो अनागारिक धर्मपाल के व्यय पर उसे कॉलंबो जाकर शिक्षा प्राप्त करने की अनुमति देने के लिए राज़ी हुए। फिर युवा वलिसिंह कॉलंबो आया, जहाँ पर अनागारिक की माँ, मल्लिका हेवावितारण ने उसकी देखभाल की। यू. बी. दॉलपिहिल्ल कैंडी के एक अंग्रेज़ी के ज्ञानी था, जिसने जापान में वस्त्र बुनाई का अध्ययन करने के लिए हेवावितारण परिवार के द्वारा प्रदान की जाने वाली एक छात्रवृत्ति प्राप्त की थी। उसे उस युवा लड़के को सीखाने के लिए कहा गया था, जिसका दाखिला मरदान के महाबोधि परिषद् के द्वारा स्थापित महाबोधि कॉलेज में कराया गया था।
देवप्रिय वालिसिंह (बीच में) विद्योदय परिवेण के भिक्षुओं के साथ भिक्षु देवमित्त धर्मपाल की अस्थियों को परिवेण को सौंपते हुए।
1917 में जब अनागारिक धर्मपाल की माँ तीर्थयात्रा के लिए भारत गयी, तब 13 साल का वलिसिंह उसके साथ गया। 1915 में श्री लंका के दंगों के पश्चात काफ़ी वर्षों तक अनागारिक को ब्रिटिश अधिकारियों के द्वारा कैद किया गया था और उसे अपना अधिकांश समय कलकत्ता के जेल में बिताना पड़ा। वालीसिंह को भारत के महाबोधि परिषद् के वृत्तांत सिखाये गये। उसने बंगाली भाषा सीखी और फिर उसे भारत में स्थित आध्यात्मिक शिक्षा का सबसे प्रसिद्ध केंद्र, शांतिनिकेतन भेजा गया था, जिसकी स्थापना महान बंगाली कवि रबीन्द्रनाथ टैगोर ने की थी। तदुपरांत वह प्रेसीडेंसी कॉलेज गया, जो मद्रास में स्थित एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय है।
1931 में जब अनागारिक धर्मपाल एक भिक्षु बने, तब सहज रूप से ही महाबोधि परिषद के महासचिव तथा कोषाध्यक्ष के पदों के लिए वलिसिंह को चुना गया था। तब तक थके हुए और हतोत्साहित अनागारिक धर्मपाल समझे की उनकी वसीयत लिखने का समय आ गया है। सुदूर ऑस्ट्रेलिया की यात्रा करने का कार्य उन्होंने वलिसिंह को सौंप दिया था। अनागारिक धर्मपाल के मित्र, जॉन द सिल्वा से मंत्रणा करके क्वींसलैंड प्रांत में कागज़ात तैयार किये गये। श्री लंका के जूलियस और क्रीसी लेख्य प्रमाणक के द्वारा वसीयत का कार्यान्वयन किया गया था।
अनागरिक धर्मपाल की मृत्यु के बाद वलिसिंह और राजा हेवावितारण (अनागारिक धर्मपाल का भतीजा) अस्थियों को श्री लंका ले आये। द्वीप में देखे गये सबसे बड़े जनसमूह ने उनका स्वागत किया था। मालिगाकंद बौद्ध मंदिर में आयोजित सम्मिलन में 50 000 लोगों की उपस्थिति में, वलिसिंह ने लोगों से अनुरोध किया की वे शब्द-दर-शब्द दोहराते हुए उसके साथ प्रतिज्ञा करें, कि बौद्ध धर्म के प्रति अनागारिक धर्मपाल की निःस्वार्थ सेवा की स्मृति को अर्पित श्रद्धांजलि के रूप में वे तब तक आराम न करें, जब तक बोध गया बौद्धों को सौंपा नहीं जाता। इसने श्रोताओं को इस प्रकार उत्तेजित किया कि वे बोध गया को बौद्ध दुनिया में पुनःस्तापित करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ें।
वलिसिंह ने अनागारिक धर्मपाल के अधिकांश अधूरे कार्यों को लगभग उन्हीं के सामान उत्साह के साथ आगे बढ़ाया था। ऐसा प्रतीत होता है कि वालिसिंह वह शांत सम्झौताकार था, जिसने महाबोधि परिषद के उद्देश्यों को पूरा किया था। ब्रिटिश औपिवेशिक समय के दौरान लंदन भेजे गये अरिहंत मोद्गल्यायन तथा सारिपुत्र के अवशेषों को वापस करने के लिए ब्रिटिश सरकार को राज़ी करने में उसने जो भूमिका निभाीयी, उसे उसके समझौता करने के कौशल के लिए अधिक याद किया जाता है।
1941 में, द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापानी बौद्धों के साथ संबंध रखने के लिए ब्रिटिश सरकार के द्वारा वलिसिंह को गिरफ़्तार किया गया और उसे भारत में कैद कर दिया गया था। बाद में उसे रिहा कर दिया गया था। तत्पश्चात जब वह तुरंत श्री लंका आया, तब ब्रिटिश सरकार ने उसे महाबोधि परिषद के महासचिव होने के नाते विश्वयुद्ध के समाप्त होने तक भारत न जाने का आदेश दिया था। वलिसिंह, जो संस्थापक के सामान ही एवं प्रचुर लेखक था, उसने 'सिंहल बौद्धया' पत्रिका के प्रभाव को बढ़ावा देने में सहायता देकर महाबोधि मुद्रणालय को सक्रियता का छत्ता बना दिया था। जब महाबोधि परिषद के तुलनपत्र में लाभ दिखे, तब उसने मुद्रणालय के कर्मचारियों के लिए एक भविष्य-निधि का आरंभ किया था। उसने महाबोधि परिषद के नियमों का संशोधन किया और सिलोन में अपने बाध्य प्रवास के दौरान उसने आजीवन सदस्यता का आरंभ किया था।
सिलोन में रहते समय उसने 'भारत में स्थित बौद्ध मंदिर' नामक पुस्तक का संपादन किया था, जो उस पवित्र देश की यात्रा करने वाले तीर्थ यात्रियों की आदर्श परिदर्शिका बनी। जिस व्यक्ति को कभी ब्रिटिश सरकार के द्वारा एक अवांछित व्यक्ति घोषित कर दिया गया थाा, बाद में उसको 1961 में सारनाथ में ब्रिटिश महाराज जॉर्ज पंचम एवं रानी एलिज़ाबेथ द्वितीय के द्वारा रजत जयंती का पदक प्रदान किया गया था।
देवप्रिय वलिसिंह व्यापक रूप से महाबोधि परिषद के लिए और विशेषतः श्री लंका, भारत एवं ब्रिटेन की शाखाओं के लिए ताकत का एक अद्भुत स्रोत था। वह एकमात्र ऐसा व्यक्ति था, जिसने यह सुनिश्चित किया कि संस्थापक की मृत्यु के बाद संग नष्ट न हो जाए।