श्रीमत एडविन आर्नोल्ड एक पत्रकार, एक शिक्षक तथा प्राच्य विद्या के विद्यार्थी थे। ब्रिटिश साम्राज्य के प्रबल समर्थक होने के बावजूद वे भारतीय सांस्कृतिक विरासत के प्रशंसक थे। वे पहले एक स्कूल के अध्यापक के रूप में भारत गये (पूने शहर में), और तत्पश्चात एक प्रधानाचार्य बने। बोध गया, जो बौद्ध भक्तों के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है, 1886 में एक यात्रा के बाद उसका पुनःअन्वेषण करके उसे अंग्रेज़ी भाषी दुनिया के अवधान में लाने का श्रेय इनको जाता है।
उन्होंने बुद्ध जी के जीवन तथा उनके संदेश का वर्णन करते हुए एक महान कविता लिखी, जिसका नाम 'द लाइट ऑफ़ एशिया' (‘एशिया का अलोक’) था। इस कविता ने महात्मा बुद्ध तथा विज्ञान के बीच के संबंध को दर्शाते हुए दुनियाभर के, विशेषतः अमेरिका और यूरोप के बुद्धजीवियों को आश्चर्यचकित कर दिया। सिलोन में उसने युवा अनागारिक धर्मपाल के मन में इस पवित्र स्थल की यात्रा करने की चिंगारी जलायी, और उसके बाद बोध गया के प्रबंधन-नियंत्रण को बौद्धों के हाथों में वापस लाने के लिए एक वैश्विक अभियान का आरंभ करने के लिए महाबोधि परिषद् की स्थापना की थी।
लंदन डेली टेलीग्राफ़ में छपे गये अर्नोल्ड के लेखों ने बाद में बोध गया को गैर-बौद्धों के नियंत्रण से मुक्त कराके उसके पूर्व गौरव को पुनःस्थापित करने के लिए धर्मपाल के द्वारा किये गये प्रयत्नों का पूरी तरह समर्थन किया था। उन्होंने उस समय के प्रभावशाली औपनिवेशिक व्यक्तियों के साथ मिलकर इस कार्य के लिए लंदन में समर्थन जुटाते हुए ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार से एक याचिका दायर की। उनकी प्रसिद्ध कविता ने तत्कालीन भारतीय राष्ट्रीय नेताओं को भी प्रभावित किया था, जैसे; महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू तथा डॉ. बी. आर. आंबेडकर आदि। ये स्वतंत्र भारत के प्रथम तथा प्रमुख नेता थे, जिन्होंने आज़ादी के दो साल बाद 1949 के बोध गया मंदिर अधिनियम की व्यवस्था की थी। इस अधिनियम ने हिंदुओं के साथ एक संयुक्त प्रबंधन समिति के द्वारा मंदिर का 50 प्रतिशत नियंत्रण-अधिकार बौद्धों को सौंप दिया। आर्नोल्ड और अनागारिक धर्मपाल ने एक घनिष्ठ और मिलनसार मित्रता को बनाये रखा था।
जब भी अनागरिक लंदन की यात्रा करते थे, तब अर्नोल्ड उनसे मिलने आते थे, उनके पहुँचने के बाद बंदरगाह पर उनका स्वागत करते थे और अपने घर ले जाते थे। इंग्लैंड में उन्होंने बुद्धजीवियों के एक संग से उनकी मुलाकात करवायी थी। वे केवल अंग्रेज़ी के ही नहीं, बल्कि जापानी, लैटिन, पाली, संस्कृत, तुर्किश, अरबिक, ग्रीक, फ्रेंच, जर्मन, हिब्रू, पर्शियन, तथा मराठी के भी उत्कृष्ट ज्ञाता भाषाविद थे। डी. एच. लॉरेंस, टी. एस. एलियट, रुडयार्ड किपलिंग, डबलिव, बी. यीट्स, लियो टॉलस्टॉय तथा जेम्स मेसफ़ील्ड आदि साहित्यकारों पर उनकी कविता तथा अन्य रचनाओं का उल्लेखनीय प्रभाव था। श्रीमत विंस्टन चर्चिल जब जवाहरलाल नेहरू को खत लिखते थे, तब उस कविता के शीर्षक, 'द लाइट ऑफ़ एशिया' को उद्धृत करते थे और जब भी राजनीतिक सक्रियता के लिए जवरहरलाल नेहरू को भारत के ब्रिटिश जेल में बंदी बनाया जाता था, तब वे उस कविता की एक प्रति अपने पास रखते थे। 13 भाषाओँ में कविता का अनुवाद किया गया था और नाटकों, चलचित्रों, तथा गीतिनाट्यों में उसका चित्रण किया गया था। लगभग प्रत्येक श्री लंकाई बौद्ध परिवार के घर में 'द लाइट ऑफ़ एशिया' की एक प्रतिलिपि थी। अर्नोल्ड ने तीन बार शादी की थी और उसकी आखरी पत्नी एक जापानी महिला थी। उनके चार बेटे थे, जिनमें से एक कुछ समय के लिए सिलोन में एक कॉफ़ी बागान का मालिक था। उनकी अभूतपूर्व कविता, जो 19वीं सदी के अंत 20 वीं सदी के आरंभ में दुनिया में तूफ़ान उठा दिया था, उस कविता तथा श्रीमत एड्विन अर्नोल्ड के स्मरण में श्री लंका का बौद्ध युवा संघ (The YMBA) अभी भी प्रतिवर्ष लाइट ऑफ़ एशिया वक्तृत्व प्रतियोगिया का आयोजन करता है।
For more details see:
https://www.gutenberg.org/ebooks/8920
https://www.bps.lk/olib/wh/wh159_Peiris_Edwin-Arnold--His-Service-To-Buddhism.html
Ramesh, J (2021). The Light of Asia: The Poem that Defined India. Penguin, Gurgaon.