(1864 से 1885 तक)
दॉन डेविड हेवावितारण, जो बीसवीं सदी के आरंभ में ‘अनागारिक धर्मपाल’ के नाम से पूरी दुनिया में जाने जाते थे, उनका जन्म 17 सितंबर 1864 को कॉलंबो-कॉटहेन में हुआ था। उनकी माता का नाम मल्लिका था और पिता का नाम दॉन करोलिस हेवावितारण था। आम तौर पर एक ग़लतफ़हमी फैली हुई है कि इनका जन्म मातर हित्तॅटिय में हुआ था, किंतु यह ग़लत है।
उस समय हेवावितारण परिवार पेटा में रहते थे, जो तत्कालीन सिलोन (वर्तमान में श्री लंका) का एक आवासीय हिस्सा था। किंतु जल्द ही निकटवर्तो कॉटहेन शहर के एक स्वास्थ्यप्रद मोहल्ले में चले गये, जहाँ बड़े बगीचेवाले घर और पेड़ों से घिरे हुए रास्ते थे। जैसे कि उस समय आवश्यक था, उसका जन्म कॉटहेन के सेंट बेनडिक्ट्स गिरजाघर में पंजीकृत किया गया था। उसे ईसाई नाम 'डेविड' दिया गया था और 'दॉन' पहले से ही उसके पिता का नाम था।
डेविड की प्राथमिक शिक्षा कई स्कूलों में हुई। इनमें कॉलंबो का बालिका शिशु निवास, पेटा कैथोलिक स्कूल (बाद में सेंट मेरीस), बैप्टिस्ट सिंहली स्कूल, सेंट बेनडिक्ट्स कॉलेज, सी.एम.एस. बालक अंग्रेज़ी स्कूल-कोटटे, सेंट थोमस महाविद्यालय सदृश संस्थान तथा कॉलंबो अकादमी (बाद में रोयल कॉलेज) आदि अंतर्गत हैं। उसकी पढ़ाई में कुछ उथल-पूथल होने के बावजूद, उसके माता-पिता ने उसे बौद्ध धर्म तथा अपनी मातृ भाषा सिंहली भाषा का एक मज़बूत आधार बनवा दिया।
उसने काफ़ी छोटी उम्र में गुरु हरमानिस से सिंहली भाषा सीखी, जो उस समय के एक जाने-माने सिंहली विद्वान थे। उसके माता-पिता ने उसमें 'त्रिरत्न' अर्थात बुद्ध, धम्म (सिद्धांत), संघ (भिक्षु-गण) के प्रति भक्ति जगायी, जो बौद्ध धर्म के तीन स्तम्भ हैं। अंतिम वर्षों में उन्होंने ऐसा कहा है, “मैं स्कूल में निडर और हिम्मती था। मैं एक तरह से कुलीन स्वभाव का था और किसी की परवाह नहीं करता था। घर पर भी मेरा स्वभाव वैसा ही था और जो मैं चाहता था, वह मुझे मिल जाता था। मैं ज़िद्दी था, दृढ था, और किसी भी असहिष्णुता को सह नहीं सकता था। मुझे लौकिक वस्तुओं से लगाव नहीं था। मुझे सादगी, तन्हाई और किसी भी प्रकार से गरीबों की मदद करने से लगाव था, यहाँ तक कि मैं वे सब त्याग दूँ, जो मेरे पास था…।” वे अपने प्रिय माता-पिता के बारे में अत्यंत प्रेम और आदर के साथ लिखते हैं, हालाँकि कभी-कभी उनका विवेचन भी करते हैं : अपनी माँ को उसके अलगाव पर और पिता को उसके अनुशासन की भावना पर। वे कहते हैं कि धर्म और अनित्यता के बारे में उनके ज्ञान का श्रेय उनकी माँ को जाता है, जिनकी वजह से उन्हें अपने साधारण जीवन को त्याग देने का आधार मिला था। वे कहते हैं कि उन्हें नौ साल की उम्र में ब्रह्मचर्य (शुद्ध आचरण) से परिचित कराकर लौकिक वस्तुओं पर निर्भर न रहने के लिए जो निरंतर सलाह देते थे, वे उनके पिता थे।
कम उम्र में ही डेविड का मन आध्यात्मिक विचारों, समाधि एवं गरीब लोगों की सेवा करने की ओर आकर्षित हो गया था। यह साफ़ नज़र आ रहा था कि यह नव युवक ब्रह्म आंदोलन की ओर आकर्षित हो रहा था। उससे इसका परिचय भिक्षु मिगेटटुवत्ते गुणानंद जी से हुआ था था और उसने 1878 में प्रकाशित ‘थियोसॉफ़िस्ट’ को उसके पहले अंक से ही पढ़ना आरंभ किया। 1880 में जब अमेरिकी नागरिक कर्नल हेनरी स्टील ओल्कॉट और रूस की महोदया हेलेना ब्लावाट्स्की (ब्रह्मविद्या संग के दो मुख्य संस्थापक) श्री लंका आये, तब युवा डेविड ने ओल्कॉट के व्याख्यानों में भाग लिया और आध्यात्मिक विकास के बारे में अधिक उत्सुकता से पढ़ा। उसे सन्यासी बनने की इच्छा थी और तब तक शाकहारी बन गये थे। 1884 में वे ब्रह्मविद्या संग में शामिल हो गये। इन प्रारंभिक वर्षों के दौरान उन्होंने वर्ष 1885 में सार्वजनिक अनुदेश विभाग में भी काम किया। फिर भी उनकी रुचि पहले से ही आध्यात्मिकता ओर सेवा करने की ओर दृढ़ता से मुड़ी हुई थी।
डेविड ऐसे पारिवारिक माहौल में बड़ा हुआ था, जिसमें सुंदर बगीचा, बचपन का बड़ा-सा घर और उसके माता-पिता थे। उन्होंने धर्म के अभ्यास को समझकर पूरे दिल से अपने बेटे को उसके प्रति प्रोत्साहित किया और उसके जीवन में एक आध्यात्मिक नींव डाली। आध्यात्मिक प्रगति और बुद्ध जी की शिक्षाओं का अभ्यास करना उसके जीवन का आधारभूत उद्देश्य बन गया। जिस अन्य कार्य में भी वह शामिल होता था, वे सब इस उद्देश्य के प्रति उसकी उत्साही निष्ठाओं से उत्पन्न होते थे।
21 वर्ष की उम्र में डेविड ने एक सन्यासी जीवन को अपनाने के लिए, अपने माता-पिता के आशीर्वाद से अपने परिवार की सभी सुख-सुविधाएँ छोड़ दीं। (तब तक हेवावितारण परिवार कॉल्लुपिटिय में ऐलो ऐवन्यू में सुंदर बगीचे वाले एक बड़े-से घर में रहने लगे थे।)