भारत की महाबोधि परिषद (MBSI) का मुख्यालय कोलकाता (पूर्व काल में कलकत्ता) में स्थित है, जो एक समय में भारत की राजधानी थी। यह विश्वविद्यालय के बगल में 4A, बंकिम चटर्जी रास्ते पर स्थित है, जो पुरानी राजधानी का प्रमुख स्थान था। वह ‘श्री धर्मराजिका चैत्य विहार’ नाम से जाना जाता है। पहले वह 4A, कालेज स्कुएर में स्थित था, जो कालेज स्ट्रीट-हरिसन रास्ते के चौराहे की ओर मुड़ गया था। बंगाल के ब्रिटिश राज्यपाल लार्ड रोनार्ल्डशे के द्वारा 26 नवंबर 1920 को समारोहपूर्वक उद्घाटन किये जाने के साथ कोलकत्ता के नगर निगम ने इस MBSI इमारत को विरासत भवन घोषित कर दिया।
1891 में ही अनागारिक धर्मपाल बोध गया से वापस सिलोन लौटते समय कोलकाता आये थे। उन्होंने बोध गया के प्रबंध से संबंधित अधिकार को बौद्ध-धर्मियों को वापस दिलाने का वादा किया था और उस अभियान के लिए धन जुटाने हेतु रंगून, बर्मा में फिर यात्रा करने का निर्णय लिया। उस समय तक बर्मी विश्रामशाला के कारण केवल कुछ बर्मी बौद्ध भिक्षु ही बोध गया गये थे। बंगाल के ब्रह्मविद्या संग के द्वारा सिलोन ब्रह्मविद्या संग के सदस्य धर्मपाल का आदर-सत्कार किया गया। वे उस संग के सचिव नील कमल मुखर्जी के यहाँ रहे। मुखर्जी धर्मपाल का अत्यंत प्रिय मित्र बन गया। अपना एक भतीजा, अपने भाई एडमंड हेवावितारण के बड़े बेटे (जो नील हेवावितारण नाम से जाना जाता है) का नाम नील कमल रखने से यह प्रकट होता है। नील हेवावितारण बाद में स्वतन्त्रता से पहले के सिलोन की राज्य सभा का सदस्य (1936-39) बन गया।
अपनी यात्रा के दौरान धर्मपाल समझे कि भारत की तद्युगीन राजधानी में बौद्ध धर्म नहीं के बराबर है। वे यह भी समझे कि जब भविष्य में बौद्ध भक्त बौद्ध स्थलों की यात्रा करने आएँगे, तब उन्हें रहने की जगह की आवश्यकता है। सिलोन में महाबोधि परिषद की स्थापना करने के बाद उनका मानना था कि बोध गया या अन्य पवित्र स्थल से संबंधित अभियान चलाना है तो, वह कार्य भारत की राजधानी में स्थित मुख्यालय से संपन्न होना चाहिए। भारत की महाबोधि परिषद के मुख्यालय की भारतीय शाखा की स्थापना में लगभग तीन दशक बीत गये और उसका नाम श्री धर्मराजिका चैत्य विहार रखा गया। उस समय (1915) सिलोन के जातीय दंगे के कारण ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के द्वारा धर्मपाल को ‘समुद्र या भूमि के द्वारा’ कोलकाता से निकलना मना कर दिया था। सिलोन में उनके ब्रिटिश साम्राज्य विरोधी आंदोलन के कारण बंगाल के लेफ्टिनेंट राज्यपाल ने उन्हें उपद्रवी की नज़र से देखा। उन्होंने अपनी नज़रबंदी का समय मुख्यालय के स्थापत्य एवं भवन निर्माण में बिताया। उसी वर्ष में परिषद का नाम भारत की महाबोधि परिषद के अर्थ में Maha Bodhi Society of India (MBSI) रखा गया। कलकत्ता के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और विश्वविद्यालय के कुलपति श्री आशुतोष मुखर्जी भारत की महाबोधि परिषद के अध्यक्ष बन गये, जब सचिव के पद पर धर्मपाल जी थे।
नयी इमारत के निर्माण के लिए धन का बड़ा हिस्सा (65,123 रुपये) हवाई की श्रीमती मेरि रॉबिन्सन फोस्टर से मिला। बड़ौदा के महाराजा गायकवाड़ ने 10,740 रुपये दिये। अनागारिक ने अपने माता-पिता, भाई और भाभी की याद में 11,000 रूपये दिये। डॉ. सी. ए. हेवावितारण और उनकी पत्नी ने 2,000 रुपये, श्री एन. डी. एस. डि सिल्वा और उनकी पत्नी ने 1,500 रुपये, श्री पी. ए. पीरिस ने 1,000 रुपये दिये और कई अन्य लोगों से 3,686 रूपये के बराबर के लघु मात्रा के दान मिले। छोटे दाताओं में से ब्रिटिश सैनिक सजेंट रायन भी था, जिसने प्रथम विश्व युद्ध में भाग लिया था। उसने 3 रूपये दिये।
भारत की महाबोधि परिषद के मुख्यालय के उद्घाटन के साथ ब्रिटिश राज ने भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष मुख्यालय की इमारत के एक भाग में निर्मित चैत्य में प्रतिष्ठापित करने के लिए सौंपे गये थे। वह पवित्र कार्यक्रम बड़ी भीड़ की उपस्थिती में धूमधाम से पूर्ण धार्मिक गौरव के साथ संपन्न हुआ था। कहा जाता है कि कुसिनारा (कुशीनगर) में गौतम बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद उनके पवित्र अवशेष तद्युगीन राजा के द्वारा आठ स्तूपों में प्रतिष्ठापित किये गये। तत्पश्चात सम्राट अशोक ने उन्हें 84,000 भागों में बाँटकर भारतीय उपमहाद्वीप के उनके विस्तृत साम्राज्य के स्तूपों में प्रतिष्ठापित किया था। गौतम बुद्ध के अवशेष जो भारत की महाबोधि परिषद के मुख्यालय एवं धर्मराजिका चैत्य विहार में प्रतिष्ठापित किये गये हैं, वे भट्टीप्रोलु स्तूप की मंजूषा से लेकर बाद में मद्रास संग्रहालय में रखे गये थे।
(अतिरिक्त जानकारी के लिए देखें, The History of the Sri Dharmarajika Chaitya Vihara; a publication of the Maha Bodhi Society of India, 2012)
The headquarters of the Maha Bodhi Society of India, on Chatterjee Street, Kolkota
बुधवार, 29 अप्रैल 2026 को, सुबह 8:30 बजे, महाबोधि सोसाइटी के बोधगया केंद्र में सोसाइटी के संस्थापक अनागारिक धर्मपाल के 93वें महापरिनिर्वाण दिवस के उपलक्ष्य में पुष्पांजलि अर्पित की गई। गंभीर सभा ने महान बौद्ध पुनरुत्थानवादी को हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित की, पवित्र महाबोधि महाविहार को पुनर्स्थापित करने और दुनिया भर में बुद्ध की शिक्षाओं को फैलाने में उनके अथक प्रयासों को याद किया। समारोह में उनकी स्थायी विरासत के प्रति गहरी श्रद्धा और कृतज्ञता परिलक्षित हुई। इस अवसर पर उपस्थित लोगों में बोधगया मंदिर प्रबंधन समिति की सचिव डॉ. महाश्वेता महारथी; महाबोधि मंदिर के मुख्य भिक्षु, भिक्खु चालिंदा; भिक्खु कोंडन्ना; भिक्खु भुवन; भिक्खु बोधानंद; भिक्खु अशोक; रेवरेंड शोफू बांची (मुरियोकान, क्योटो, जापान); रेवरेंड केन्यो हागीवारा (सेगंजी, ऐची, जापान); बुद्धगया सेंटर के आदरणीय भिक्षुओं में वेन. जिनानंद थेरो, वेन. सुशीला थेरो, वेन. वांगीसा थेरो के साथ डॉ. कैलाश प्रसाद और श्री किरण लामा शामिल थे।
महाबोधि सोसाइटी ऑफ इण्डिया के महासचिव पूज्य भन्ते पी0 सीवली थेरों की अध्यक्षता में आज दिनांक 04.01.2026 को कार्यालय महाबोधि सोसाइटी ऑफ इण्डिया सारनाथ केन्द्र में सारनाथ के बौद्ध विहारों के भिक्षु प्रभारियों, प्रबन्धकों तथा सारनाथ-वाराणसी उत्तर प्रदेश के बौद्ध संगठनों से जुड़े सदस्यों व उपासक/उपासिकाओं की बैठक बुलाई गई। बैठक में आगामी दिनांक 15 से 21 जनवरी के बीच आयोजन की जाने वाली धम्मचक्क पूजा सारनाथ-2026 के संबंध में विचार-विमर्श हुआ।
महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया बुद्ध गया सेंटर ने महाप्रजापति गौतमी सुभारती स्कूल ऑफ बुद्धिस्ट स्टडीज देहरादून रास बिहारी सुभारती यूनिवर्सिटी देहरादून के साथ मिलकर म्यांमार के वैश्विक साझेदारों के साथ 'बोधगया और बौद्ध धर्म की वैश्विक विरासत' पर एक सेमिनार आयोजित किया; 21 सितंबर, 2025 को बुद्ध गया केंद्र में 'इतिहास, विरासत और समकालीन प्रासंगिकता' पर एक व्याख्यान।